राजकुमार पार्श्वनाथ और तीर्थंकर पार्श्वनाथ


जैन धर्म की मुख्य दो धाराएँ हैं- एक दिगम्बर जैन और दूसरे श्वेताम्बर जैन। दिगम्बर, दिग्-अम्बर-दिगम्बर। दिशाएँ ही जिनकी अम्बर- वस्त्र हैं अर्थात् नग्न। श्वेताम्बर स्पष्ट है जो श्वेत-सफेद वस्त्र धारण करते हैं। जिनके साधु नग्न रहते हैं वे दिगम्बर और जिनके साधु सफेद वस्त्र धारण करते हैं वे श्वेताम्बर। श्वेताम्बर परम्परा में तीर्थंकरों चौबीस ही मान्य हैं किन्तु वहां तीर्थंकरों की सवस्त्र, राजसी रूप में पूजा होती है। दिगम्बर परम्परा में अरहंत अवस्था, अर्थात् केवलज्ञानोपरान्त पूजा होती है।

प्रतिमा- मध्यप्रदेश के सिद्ध-अतिशय क्षेत्र नैनागिर में 82 से.मी. उत्सेध व 46 से.मी. चौड़े शिलाफलक में एक विलक्षण प्रतिमा प्राप्त हुई है। इस प्रतिमा में दो अलग-अलग आकृतियों का समान स्तर पर साथ-साथ मूर्तांकन किया गया है। बाँयी प्रतिमा स्पष्टतः तीर्थंकर पार्श्वनाथ की है। तीर्थंकर पार्श्वनाथ कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यानस्थ हैं। कुंचित केश, उष्णीस एवं शीश पर पंच सर्पफण हैं। सर्पफण के ऊपर त्रिछत्र है। त्रिछत्र के दोनों ओर गजराज कलश लिये अभिषेक कर रहे उत्कीर्णित हैं। त्रिछत्र के ऊपर ढोल-वादक गंदर्भ है, जिसकी आगे की आकृति भग्न हो गई है। वक्ष पर श्री वत्स चिह्न तीर्थंकर का स्पष्ट द्योतक है। तीर्थंकर के पार्श्व भाग में दोनों ओर अपेक्षाकृत लघु चामरधारी हैं, किन्तु इनकी कलात्मकता उत्कृष्ट है। चॉमरधारियों की सभी देवोचित आभूषणों के अतिरिक्त विशेषता यह है कि अधोवस्त्र पैरों में नीचे तक दर्शाया है, उसकी सलें स्पस्ट देखीं जा सकती हैं। तीर्थंकर आकृति को बगल से देखें तो सिंहासन के ऊपर से ही सर्प कुण्डली बनी हुई है जो ऊपर जाकर पंच-फणाटोप बनाये है। डॉ. जिनेन्द्र कुमार जैन ने इस प्रतिमा का अच्छा परिचय लिखा है किन्तु उन्होंने इस प्रतिमा के सप्त फण आच्छादित लिखा है जबकि पांच फण हैं।

दायीं ओर दूसरी आकृति त्रिभंग मुद्रा में एक पुरुष की आकृति है, जिसे राजसी अलंकारों से अलंकृत किया गया है। कानों में कर्णावतंस, गल-मौक्तिक हार, सुन्दर मुकुटाटोप, सिर के पीछे प्रभामण्डल, भुजबंध, कटिसूत्र, पैजनिया व अधोवस्त्र आदि से अलंकृत है। पुरुष आकृति की दोनों हथेलियाँ टूटी हुई हैं, इससे ज्ञात नहीं होता है कि हाथ में क्या धारण किये है। 

दोनों आकृतियाँ एक ही एक ही सिंहासन पर स्थित हैं। आसान में नीचे बीच में चक्र के दोनों ओर विरुद्धाभिमुख दो सिंह, उनके ऊपर चौकी, उसपर आसन जो आगे की ओर पलासना जैसा लटक रहा है। 

विश्लेषण- तीर्थंकर के तो पार्श्वनाथ के प्रायः सभी लक्षण सपरिकर होने से स्पष्ट हैं कि यह भगवान पार्श्वनाथ प्रतिमा है। समानान्तर पुरुषाकृति को पार्श्वनाथ के साथ एक ही आसन पर समानता का स्थान दिये जाने से प्रतीत होता है कि यह प्रतिमा पार्श्वनाथ की राजकुमारावस्था की प्रतिकृति है। श्वेताम्बर जैन साखा में जीवन्त स्वामी की कल्पना है तथा उनकी प्रतिमाएं भी प्राप्त होती हैं, किन्तु वे समपादासन और कायोत्सर्ग मुद्रा में ही शिल्पित किये जाने की परम्परा है। त्रिभंगासन में नहीं, इसलिए ये जीवन्तस्वामी नहीं है। डॉ. जिनेन्द्र कुमार जैन के अनुसार ऐसी ही दो विलक्षण प्रतिमाएँ शिवपुरी जिले की खनियाँधाना तहसील के गुडार ग्राम के निकट गोलाकोट नामक स्थल से प्राप्त हुई हैं। इन प्रतिमाओं को डॉ. नवनीत जैन ने सूर्यप्रभा नामक स्मृति ग्रंथ में प्रकाशित किया है। गोलाकोट एवं नैनागिरी से प्राप्त इन प्रतिमाओं में कुछ अंतर भी है। नवनीत जैन द्वारा प्रकाशित प्रतिमा में पार्श्वनाथ सिंहासन पर एवं पुरुष आकृति सादी पीठिका पर है। जबकि नैनागिरी की इस प्रतिमा में दोनों (पार्श्वनाथ एवं पुरुष आकृति) सिंहासन पर हैं। गोलाकोट की प्रतिमा में दोनों के वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह है जबकि नैनागिरी की प्रतिमा में केवल पार्श्वनाथ के वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह है। गोलाकोट की पुरुष आकृति दायें हाथ में कमंडलु लिये है। नैनागिरी की पुरुष आकृति की हथेली टूटी है। नवनीत जैन ने गोलाकोट की प्रतिमा को मुनि पार्श्वनाथ एवं तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा माना है। नैनागिरी से प्राप्त यह प्रतिम राजकुमार पार्श्व एवं तीर्थंकर पार्श्वनाथ की है। नैनागिरी की प्रतिमा में पुरुष आकृति के वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न एवं कमंडलु नहीं है, अतः वह मुनि अवस्था के पार्श्वनाथ नहीं हैं। लेकिन सिंहासनासीन एवं प्रभामंडल युक्त है, अतः राजकुमार पार्श्वनाथ हो सकते हैं। 

-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’

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