अयोध्या में राम नाम की लूट

उत्तर प्रदेश के चुनावों में अयोध्या में बन रहे राम मंदिर को लेकर भाजपा अपनी दावेदारी मजबूत करने में लगी थी। लेकिन मंदिर के नाम पर जमीन घोटाले के आरोप में भाजपा फंस गई है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने जब रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में फैसला दिया और मंदिर विवाद का रास्ता साफ हुआ तो उस के बाद खबर आई कि विधायकों, मेयर, आयुक्त, एसडीएम और डीआईजी के रिश्तेदारों ने अयोध्या में जमीनें खरीदी हैं। एक राष्ट्रीय अखबार की रिपोर्ट में बताया गया है कि ये जमीन महंगे दामों में ली गई हैं। वहीं महर्षि रामायण विद्यापीठ ट्रस्ट ने 1990 के दशक की शुरुआत में, राम मंदिर स्थल से 5 किलोमीटर से भी कम दूर बरहटा मांझा गांव और अयोध्या में आसपास के कुछ अन्य गांवों में बड़े पैमाने पर जमीन का अधिग्रहण किया था, इस जमीन में से लगभग 21 बीघा जमीन कथित तौर पर दलितों से नियमों का उल्लंघन करते हुए खरीदी गई थी। इस खबर के सामने आने के बाद योगी सरकार ने अपर मुख्य सचिव राजस्व मनोज कुमार सिंह के नेतृत्व में जांच बैठाई है। विशेष सचिव राजस्व जमीन खरीद मामले को लेकर जांच करेंगे और शासन को 1 हफ्ते में रिपोर्ट सौंप देंगे। लेकिन अब यह मामला धार्मिक और कानूनी सरहदों से आगे बढ़ता हुआ राजनैतिक हो गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मसले को एक बार फिर हिंदू और हिंदुत्व की अपनी व्याख्या जोड़ा है। राहुल गांधी ने ट्वीट किया- हिंदू सत्य के रास्ते पर चलता है, हिंदुत्ववादी धर्म की आड़ में लूटता है। वहीं कांग्रेस पार्टी के महासचिव और मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को श्चंदे की लूटश् और श्जमीन की लूटश् पर जवाब देना चाहिए और पूरे प्रकरण की जांच करानी चाहिए। जबकि उप्र में कांग्रेस का जिम्मा संभाल रही प्रियंका गांधी ने इस मामले में एक प्रेस वार्ता में कहा कि पहले राम मंदिर के चंदे में घोटाला किया गया और अब दलितों की जमीन को हड़पा जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिला अधिकारी स्तर पर जांच हो रही है। जांच भी उच्च न्यायालय की निगरानी में की जानी चाहिए, क्योंकि राम मंदिर को बनवाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। देश भर में चंदा मांगा गया और सभी की भावनाएं हैं और वे उन भावनाओं को आहत कर रहे हैं। प्रियंका गांधी के ये इल्जाम भले ही चुनावी गणित के हिसाब से लगाए गए हैं, लेकिन इतना तो तय है कि राम के नाम पर लूट का खेल बीजेपी खेल रही है और यह अकेले अयोध्या तक ही सीमित नहीं है, इसका दायरा काशी तक फैल ही चुका है और शायद मथुरा तक भी यह बढ़ जाए। वैसे भी भाजपा सांसद हेमा मालिनी ने पिछले दिनों बयान दिया है कि मथुरा भगवान कृष्ण की जन्मभूमि है और अब वहां उनका भव्य मंदिर बनना चाहिए। उनके पहले उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी कृष्ण मंदिर की वकालत कर चुके हैं और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी बार-बार मथुरा के चक्कर काट रहे हैं। इधर काशी में पिछले दिनों काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन प्रधानमंत्री कर ही चुके हैं। जिसमें भगवान की पूजा अर्चना के साथ-साथ पूजन सामग्री के व्यापार और श्रद्धालुओं की सुख सुविधा के लिए बड़े इंतजाम किए गए हैं। हालांकि इस भव्यता की कीमत जनता की जेब से चुकाई जा रही है। बाबा विश्वनाथ के दर्शन-पूजन के लिए पहले मामूली रकम लगती थी, लेकिन अब इसकी भी बाकायदा रेटलिस्ट जारी हो गई है। जिसका भुगतान कम से कम गरीब के लिए संभव नहीं है। जब अयोध्या में राम मंदिर बन कर तैयार हो जाएगा, तब भी रामलला तक पहुंचने के मौके और हक शायद अमीरों को ही मिलेंगे, क्योंकि गरीब आदमी के लिए जेब ढीली कर भगवान का दर्शन भी विलासिता की तरह ही होगा। अब वो दिन शायद चले गए जब भगवान दीनवत्सल हुआ करते थे। अब भगवान के नाम पर व्यापार इस कदर बढ़ गया है कि दीन-दुखियों की जगह केवल अमीरों की पहुंच भगवान तक हो गई है। मंदिरों में दर्शन, पूजा और प्रसाद के नाम पर व्यापार तो शुरु हो ही गया है, मंदिरों के नाम पर बने न्यासों में जो लाखों-करोड़ों की कमाई होती है, उस पर भी व्यापारियों की नजर टिकी रहती है। कई मंदिर ट्रस्ट अपने खर्च पर गरीबों की पढ़ाई, इलाज जैसे काम करते हैं। मगर जिस तरह धर्म को धंधा बना लिया गया है, उसमें परोपकार के ये काम कितने देर तक चलेंगे, कहना कठिन है। अयोध्या में जिस तरह जमीन खरीद-फरोख्त में गड़बड़ी का मामला उजागर हुआ है, उसे भविष्य में होने वाली गड़बड़ियों का एक संकेत समझना चाहिए। मगर ऐसा लगता नहीं कि भाजपा इस संकेत को देखना या समझना चाहती है। क्योंकि इससे उसकी हिंदुत्व की राजनीति मुश्किल में पड़ जाएगी।