"आतंकियों की अराजकता को हल्के में ना लें"

पंजाब में जो हुआ उससे पता चलता है की विपक्ष कितना घबराया हुआ है। सत्ताधिश पार्टी को गिराने के लिए न जानें कितने हथकंडे अपना रहे है। आतंक और अराजकता का माहौल फ़ैला रखा है। उनको लगता है की मोदी जी डर गए है। तो हाँ मोदी जी डर तो रहे है, पर अपनी जान खोने से नहीं। मोदी जी को पता है कि यदि उसे कुछ हो गया तो उसके चाहने वालों की भीड़ जुनून से जमा होते अराजक हो जाएगी। और उनका कुछ भी बोलना, उनकी कोई भी हरकत या उनकी मौत के बदले देश में हाहाकार मच जाएगा। न जाने कितनी जाने जाएंगी, न जाने कितनी महिलाएं विधवा हो जाएंगी और न जाने कितने माताएं अपने पुत्र खो देंगी। 

मोदी जी राजीव गांधी की तरह नहीं है की बिना सोचे समझे बयान दे दें। 

इंदिरा गांधी की हत्या हुई इसके अगले रोज़ से ही दिल्ली और देश के दूसरे कुछ हिस्सों में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे। कुछ साल पहले इन दंगों पर नज़र डालने वाली एक किताब 'व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही' भी छपी थी। जिसमें दंगे की भयावहता, मृतक और उनके परिजनों के दर्द और राजनेताओं के साथ पुलिस के गठजोड़ का सिलसिलेवार ब्यौरा है।

उस वक्त भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना ग़ुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि देश हिल रहा है "जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है" इंदिरा गाँधी के उत्तराधिकारी उनके पुत्र राजीव गाँधी ने बोट क्लब में इकट्ठा हुए लोगों के सामने ये बयान दिया था, जिसमें कोई ज़िक्र नहीं था उन हज़ारों सिखों का जो अनाथ और बेघर हो गए थे, बल्कि ये वक्तव्य उनके ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने जैसा था। मानो हत्याओं को सही ठहराने की कोशिश की जा रही थी। इस वक्तव्य ने उस समय काफ़ी सनसनी मचाई थी और उसको जायज़ ठहराने में काँग्रेस पार्टी को अभी भी काफ़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।

बड़े पेड़ ने तो पाकिस्तान और isi का काम आसान किया और घोल दिया सैकड़ों परिवारों के बीच नफरत का ज़हर, राजीव के बड़े  पत्ते सलमान खुर्शीद ने कहा 84 के दंगों ने मुस्लिमों का काम आसान कर दिया, सिख-हिन्दू में दरार हम मुश्लिमों के लिए सुनहरा अवसर।

काश, इंदिरा जी भी डरती, काश इंदिरा यह सोचती की वो किस पद पर हैं यदि उन्हें कुछ हो गया तो इसका असर क्या होगा इंदिरा को पूरी इंटेलिजेंस रिपोर्ट थी उनपर हमला हो सकता है, पर उन्होंने इस बात को नजर अंदाज कर दिया। उसका भुगतान हुआ "84" के रूप में ,

बाहरी और अंदरूनी दुश्मन तो ये चाहते ही हैं कि कब फिर से भारत में अशांति फैले और वो इसका फायदा उठाये।

इंदिरा की बहादुरी का खामियाजा यह देश बहुत भुगत रहा है और उस बहादुरी से कुछ हाँसिल भी नहीं हुआ।

विपक्ष की कुछ पार्टियां सिर्फ़ राजनीतिक है सत्ता और कुर्सी के लिए लड़ती है न ही उन्हें देश की जनता से मतलब है और न ही देश से।

एक समझदार नेता समझता है कि कितने लोगों की भावनाएं और आस उससे जुड़ी होती है। वो सबकी जान दांव पर नहीं लगा सकता, क्योंकि भीड़ का आक्रोश तबाही लाता है।

यकीनन इस समय देश में अराजकता फैलाने वालों ने भीड़ को अपना हथियार बनाया है। और विपक्षी देश हित की धज्जियां उडाते भीड़ को बढ़ावा दे रहे है। और अप्रत्यक्ष तौर पर आतंकियों की मदद कर रहें हैं।

सोशल मीडिया से लेकर आतंकियों की हरकतों के उकसाने के बाद भी मोदी सरकार संयम से काम ले रही है यह बात उनकी दीर्घकालीन सोच और समझदारी का परिचय दे रही है, जो प्रशंसनीय है। पर आतंकी जानते नहीं ये इंसान बोलने में नहीं कर दिखाने में विश्वास रखता है। एक दिन सुबह जैसे नोटबंदी, तीन तलाक, धारा 370 और सर्जिकल स्ट्राइक जैसी ख़बरों ने सबको चौंका दिया था वैसे ही इनकी भी हस्तियाँ ना मिट जाए। 

साथ ही मौजूदा सरकार को आतंकियों की अराजकता को हल्के में ना लेकर कमान कसने की और एहतियात बरतने की भी जरूरत है।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगलूरु,कर्नाटक)