अंतर क्यूँ माँ

                                              

क्यूँ सिर्फ़ कर्तव्यों की गिनती कराई 

नही अधिकारों से अवगत कराया 

क्यूँ माँ केवल गुड़िया ही लाकर दी 

नही हाथ में बंदूक़ पकड़ाई 

क्यूँ मान लिया कमजोर हूँ 

नही कर सकती रक्षा अपनी 

अपमान में भी धीरता का पाठ पढ़ाया 

जवाब जानती थी ,हर अपमान का 

नही नज़रों को सीधा रखना सिखाया 

नीची निगाह को ही संस्कार बताया 

माँ भूल गईं तुम संस्कार में 

शुरू से ही नारी के गुण सिखाते 

कमजोर बनाती गई 

मेरी चुप्पी को फिर 

अपराध की स्वीकारोक्ति माना गया 

तुमने तो कभी जबाव दिया नही 

मुझे भी भीरुता का पाठ पढ़ाया 

क्यूँ नही देखा गार्गी लक्ष्मी भी जन्मी इस भूमि पर 

माँ मुझे तुम्हें मेरी ताक़त बतानी थी 

अपनी रक्षा को स्वयं कवच बनाना था 

रोटी और संस्कार की ही छवि दिखलाई 

फ़ौलादी जज़्बात संग फ़ौलादी प्रयास सीखती 

निर्भया निर्भय जीवन जी पाती

क्यूँ कोमलांगी रूप सँवारा 

जब तू जानती थी ये दुनिया 

नही जीने देती तो पत्थर का तराशना था 

रूप गुण की आत्ममुग्धता से ऊपर रखना था 

स्त्री अब केवल मांसल देह नही है 

तलवार की नुकीली नोक सा बनना होगा 

माँ अब बेटी की शिक्षा बदल दे 

आँखों को सीधी रख 

निर्लज्ज आँखों का भेदना सिखा माँ 

उसके देवी के रूप से उसे 

जीने के लिए कंगन नही ताक़त की 

तलवार दिला 

पैरों में पायल नही लोहे के जूते पहना 

एक सलीम पाला रेगिस्तान 

आज की बालिका को भी 

वही सिखा 

सवि शर्मा 

देहरादून