हर रोगी की पहचान से होगा टीबी का खात्मा

- दिल की बीमारियों और स्ट्रोक के साथ-साथ टीबी दुनियाभर में होने वाली मौतों की 10 प्रमुख वजहों में शामिल है। टीबी से जुड़ी मौतें टेलीविजन पर बहस का हिस्सा नहीं बनतीं। अधिकतर ये अखबार के अंदर के पन्नों में छिपकर रह जाती हैं। टीबी मरीजों की लंबी होती सूची महज आंकड़ों में सिमट जाती है।

दुनिया में सात करोड़ लोग टीबी से ग्रस्त हैं। प्रत्येक वर्ष 25 से 30 लाख लोगों की इससे मौत हो जाती है। वहीं भारत में हर तीन मिनट में दो मरीज टीबी के कारण दम तोड़ देते हैं। हर दिन चालीस हजार लोगों में इसका संक्रमण हो जाता है। इसे फेफड़ों का रोग माना जाता है, लेकिन यह फेफड़ों से रक्त प्रवाह के साथ शरीर के अन्य भागों में भी फैल जाता है। भारत ने पिछले वर्ष सबसे अधिक 24.04 लाख टीबी अथवा क्षय रोग के मामले अधिसूचित किए, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का अनुमान 26.9 लाख मामलों का था। इससे संकेत मिलता है कि करीब तीन लाख मरीज राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम से छूट गए। यह बात टीबी पर जारी एक वार्षिक रिपोर्ट में सामने आई है।

     भारत टीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल टीबी से 79,144 मौतें होने की जानकारी आई है, जो कि डब्ल्यूएचओ के 4.4 लाख मौत के अनुमान से बहुत कम है। अनुमानित मामलों और अधिसूचित मामलों में अंतर में काफी कमी आई है। ऐसा निजी स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र के साथ अधिक संपर्क और अन्य पहलों के चलते हुआ है। इस लिहाज से इसमें पिछले वर्ष की तुलना में 14 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है। वहीं निजी क्षेत्र में करीब 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि 6.78 लाख क्षय रोगी अधिसूचित किए गए। स्वास्थ्य विभाग ने वार्षिक रिपोर्ट जारी करते हुए इस कार्य में सामूहिक प्रयासों की प्रशंसा करते हुए कहा था कि सरकार 2025 तक देश से क्षय रोग के उन्मूलन को प्रतिबद्ध है, जो कि वैश्विक लक्ष्य से पांच वर्ष पहले है। महत्वाकांक्षी लक्ष्य के अनुरूप कार्यक्रम का नामकरण संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) से बदलकर राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) कर दिया गया है।

     राज्य टीबी सूचकांक पर अंक के हिसाब से गुजरात, आंध प्रदेश और हिमाचल प्रदेश 50 लाख से अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की श्रेणी में क्षय रोग नियंत्रण के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले तीन शीर्ष राज्य हैं। रिपोर्ट में त्रिपुरा और नगालैंड 50 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले राज्य हैं। दादर एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले केंद्र शासित प्रदेश चुने गए हैं। इस रैंकिंग से सभी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए प्रोत्साहित होंगे। जल्द पहचान और त्वरित उचित इलाज क्षय रोग के उन्मूलन के लिए जरूरी है। इस वर्ष की मुख्य विशेषता यह है कि पहली बार केंद्रीय टीबी डिवीजन (सीटीडी) ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा क्षय रोग उन्मूलन के लिए किए गए प्रयासों पर एक त्रैमासिक रैंकिंग जारी की। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल की तरह ही क्षय रोग के कुल मामलों में से आधे मामले पांच राज्यों उत्तर प्रदेश 20 प्रतिशत, महाराष्ट्र नौ प्रतिशत, मध्य प्रदेश आठ प्रतिशत, राजस्थान और बिहार दोनों सात-सात प्रतिशत अधिसूचित किए गए।

     इससे पहले, साल 2017 में केंद्र सरकार ने 2025 तक टीबी को समाप्त करने के लक्ष्य के साथ इसके उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय रणनीतिक योजना विकसित की थी। कुछ राज्यों ने 2025 से पहले भी इसे मिटाने की प्रतिबद्धता जताई है। हिमाचल प्रदेश का लक्ष्य 2021 तक तथा सिक्किम और लक्षद्वीप का लक्ष्य 2022 तक इससे मुक्त होना है। रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में 24.04 लाख से अधिक रोगी चिन्हित किए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 14 प्रतिशत ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल टीबी रोगियों में से 2.9 लाख लोगों की पहचान नहीं हो सकी। देशभर में बगैर पहचान वाले 10 लाख मामलों में से 7.81 लाख मामलों को चिन्हित कर लिया गया है।

     पहले टीबी के खिलाफ लड़ाई काफी कठिन कार्य था, लेकिन अब यह ऐसा नहीं है। हम 2025 से पहले ही टीबी के खिलाफ लड़ाई जीत सकते हैं। टीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी क्षेत्र ने 2012 में 3,000 के मुकाबले पिछले साल सात लाख मामलों का पता लगाया। सफलता दर भी 79 प्रतिशत से बढ़कर 81 प्रतिशत हो गई। हालांकि भारत जानलेवा संक्रामक महामारी टीबी का गढ़ बन चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की द ग्लोबल ट्यूबरकुलोसिस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में टीबी मरीज दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। ड्रग रेसिस्टेंट टीबी, टीबी की वह खतरनाक किस्म है, जिस पर दो सबसे ताकतवर एंटी टीबी ड्रग्स भी नाकाम साबित हो जाते हैं। दुनिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे एक जिंदा बम और भयंकर स्वास्थ्य संकट का नाम दे चुके हैं। इससे भी अधिक टीबी एक ऐसी बीमारी है, जो आपके जीवन के सबसे उत्पादक काल यानी 15-59 आयु वर्ग के लोगों को अपनी चपेट में लेती है।

     केंद्र सरकार टीबी के रोगियों को पोषण भत्ते के रूप में महज 500 रुपए महीने देती है। सरकारी लालफीताशाही और समय पर फंड न होने से कई बार वह मरीज को मिल ही नहीं पाता। भले ही टीबी कोरोना वायरस के जितनी संक्रामक नहीं है, लेकिन घातक उतनी ही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दिल की बीमारियों और स्ट्रोक के साथ-साथ टीबी दुनियाभर में होने वाली मौतों की 10 प्रमुख वजहों में शामिल है। टीबी से जुड़ी मौतें टेलीविजन पर बहस का हिस्सा नहीं बनतीं। अधिकतर ये अखबार के अंदर के पन्नों में छिपकर रह जाती हैं। टीबी मरीजों की लंबी होती सूची महज आंकड़ों में सिमट जाती है। असल में टीबी को आज भी गरीबों की बीमारी के रूप में देखा जाता है, जो कि सच्चाई सेे परे है। सच यह है कि अमीर इसे छिपा लेते हैं और गरीब ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं हैं। टीबी के ऐसे हालातों के लिए हम सभी को सोचने की जरूरत है, तभी हालात में बदलाव और सुधार हो सकेंगे।

     इतना सब होने के बाद भी दबे पांव हमारे जीवन में दखल देने वाली इस महामारी को लेकर जनता में कोई खास चिंता नहीं है। वैज्ञानिक और शोधकर्ता भी कमजोर पड़े हुए हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सरकारें इस पर बहुत कम पैसा खर्च कर रही हैं। टीबी की दवाओं का कोर्स तीन महीने से लेकर नौ महीने तक का होता है। टीबी के इलाज के दौरान ध्यान रखना होता है कि दवाओं का कोर्स कभी भी बीच में न छोड़ें। कुछ लोग थोड़ा आराम होने के बाद दवाइयां लेना बीच में ही छोड़ देते हैं, जिससे दोबारा टीबी होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। इससे बचें और नियमित दवाओं का सेवन करें। देश से टीबी को पूरी तरह मिटाने के लिए हमें सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा। अगर देश पांच महीने में कोरोना वायरस महामारी के खिलाफ खड़ा हो सकता है, तो यह निश्चित रूप से टीबी से भी लड़ सकता है।

अमित बैजनाथ गर्ग

जयपुर, राजस्थान