कालीचरणों ये सवाल कभी पीछा नहीं छोड़ेंगे..!!

(पवन सिंह)

देश में जाहिल टाइप के जेहादी कालीचरणों की संख्या वाट्सअप विश्वविद्यालय ने बेतहाशा बढ़ाई है, इसमें कोई शक नहीं है लेकिन यह भी सच है विगत 70 सालों से नफरती और क्रूर व धार्मिक मूर्खताओं का जो वैचारिक जहर अब तक लोगों की शिराओं में दौड़ाया जा रहा था वो ओवर फ्लो की स्थित में आ चुका है। इस संडाध और नफरती विचारधारा के खिलाफ लोग उठ खड़े हो रहे हैं।‌ जिस सोशल मीडिया के जरिए यह विषवमन तेजी से पम्प किया था उसे लोगों ने उसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर  फिल्डर करना शुरू कर दिया। लोग सोशल मीडिया पर इस देश की मूल भावना जो कि-

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।"

अर्थात- सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।...में रची-बसी है, को बचाने के‌ लिए खुलकर आने लगे हैं। सुखद यह है कि "कालीचरणों टाइप जेहादियों" को इस देश के एक बड़े पढ़े-लिखे व संवेदनशील व सच्चे राष्ट्रवादियों ने आइना दिखाना आरंभ कर दिया है। सुखद यह भी  है कि ऐसे लोगों की संख्या रोज ब रोज बढ़ रही है। हालांकि, देश के हिंदी भाषी राज्यों की एक बड़ी आबादी कालीचरण टाइप के वायरस से गंभीर रूप से ग्रसित है लेकिन यह देखना भी सुखद है कि इन्हीं हिंदी भाषी राज्यों से कालीचरण जेहादियों के खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं। दरअसल, इस देश ने कभी अतिवादियों को पसंद नहीं किया है और लोग अतिवाद के खिलाफ हमेशा से उठ खड़े हुए हैं लोग फिर उठ रहे हैं। हां! वक्त लग रहा है लेकिन लोग जेहादी मानसिकता के तहत परोसे गये 70 साला मेहनत को एक दिन जरूर नेस्तनाबूद जरूर करेंगे। शरीर की व्याधि दवा से व आपरेशन से कुछ महीनों में दूर  हो जाती है लेकिन यदि दिमाग में वैचारिक जहर घर कर जाए तो वह समय लेता है। कालीचरणों से  लोग सवाल करने लगे हैं।

सवाल ऐसे हैं जो कभी पीछा नहीं छोड़ेंगे जैसे-

1- गोलवलकर, सावरकर, गोडसे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे तमाम नेताओं ने आखिरकार भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध क्यों किया था? 

2-आरएसएस, हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध क्यों किया था?

3- सावरकर और अन्य कालीचरण मंडली ने बर्मा बॉर्डर पर आज़ाद हिंद फ़ौज के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए भारतीय नवयुवकों की ब्रिटिश फ़ौज में भर्ती क्यों करवाई?

4-राष्ट्रवाद की बात करने वाले कालीचरणों का झुंड आखिरकार सुभाष चन्द्र बोस के खिलाफ क्यों था और अंग्रेजी हुकूमत से क्या कीमत वसूल रहा था?

5-आजादी के बाद कालीचरणों ने भारतीय संविधान का विरोध क्यों किया? आज भी ये कालीचरण मंडली भारतीय संविधान को दिल से क्यों स्वीकार नहीं करती है?

6-1929 लाहौर अधिवेशन में भारतीय तिरंगा का विरोध करने वाले लोग कौन थे।

7-सरदार पटेल संघ को सख्त नापसंद क्यों करते थे?

8-राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जो राष्ट्रवाद की सबसे ज्यादा बातें करता है, दरअसल तिरंगा और भारतीय संविधान का प्रारंभिक विरोधी रहा है। राष्ट्रीय परेड में शामिल होने को संघ अपनी सफलता मानता है जबकि वो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की एक ​कोशिश थी, इस संगठन को देश की लोकतांत्रिक विचारधारा के साथ शामिल करने की। संघ का जिद्दी रवैया इससे पता चलता है कि 1950 से लेकर 2002 तक उसने कभी अपने नागपुर मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया जबकि संघ से प्रतिबंध इसी शर्त पर हटाया गया था कि वो भारत के अधिकृत राष्ट्रध्वज एवं संविधान में आस्था प्रदर्शित करेंगे। कालीचरणों का इस पर क्या कहना है?

9-भारत माता के हाथ में तिरंगा नहीं क्यों नहीं है? 

आरएसएस द्वारा वर्णित और चित्रित की जाने वाली भारत माता के हाथों में कभी भी तिरंगा ध्वज नहीं रहा बल्कि वे भगवा ध्वज लिए दिखती हैं? प्रारंभ से ही आरएसएस का भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रतीकों, जैसे राष्ट्रीय ध्वज और संविधान, से दूरी बनाए रखने का इतिहास रहा है। ऐसा क्यों?

10-सावरकर ने  तिरंगे का तीव्र विरोध क्यों किया? 

22 जुलाई 1947 को भारत की संविधान सभा ने सर्वसम्मति से राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया। यह एक बेहद ही भावनात्मक क्षण था जब आजादी की शैशवावस्था में कदम रख रहे भारत ने स्वयं की पहचान स्थापित करने की दिशा में पहला कदम बढ़ाया था और एक राष्ट्रीय प्रतीक के माध्यम से अपनी तमाम विविधताओ को एक सूत्र में पिरोया था। लेकिन इसके सिर्फ एक सप्ताह बाद ही, यानि 29 जुलाई को  दामोदर सावरकर, जिनका जन्मदिवस नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद निरंतर रूप मनाया जा रहा है, का भारत के राष्ट्रीय ध्वज के संबंध में यह कहना था- ‘भारतीय संघ द्वारा अपनाये गए नए ध्वज में मौजूद अच्छाईयों, जो कम आपत्तिजनक हैं, का उल्लेख करते हुए मैं जोरदार ढंग से यह बात कहना चाहता हूं कि इसे कभी भी हिंदुस्तान के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्यता नहीं मिलेगी।’ इस पर कालीचरणों का क्या कहना है? 

11-डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और हिंदू महासभा तीन राज्यों में जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ सरकार क्यों चला रहे थे?

12-आजादी के बाद कई सालों तक संघ परिवार जन गण मन का विरोध क्यों करता रहा? कालीचरण गैंग का इस पर क्या कहना है?

13-क्या यह सच नहीं है कि 1937 में हिंदू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में सावरकर ने कहा था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं और यहीं से भारत के विभाजन की नींव पड़ी? कालीचरण गैंग इस पर हमेशा खामोश रहता है क्यों?

14-आखिर क्या कारण और‌ मजबूरी थी कि सावरकर, गोडसे, श्यामाप्रसाद मुखर्जी और संघ ने भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए वक़ील क्यों नहीं खड़ा किया? क्या उन्हें अंग्रेजों से अपनी वफादारी निभानी थी?

15-संघ और तमाम कालीचरण गुट के लोग क्या यह बताएंगे कि उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाहियों, फौजी अफ़सरों पर लाल क़िले में चल रहे मुक़दमे में वक़ील क्यों नहीं नियुक्त किए? 

16-आरएसएस मुख्यालय नागपुर और उसके फ्रंटल संगठनों के दफ़्तरों में 2002 से तिरंगा यानी राष्ट्रीय ध्वज फहराने की शुरुआत हुई। 2001 तक संघ मुख्यालय और उसके अन्य दफ़्तरों में तिरंगे की जगह भगवा ध्वज फहराया जाता था। संघ मुख्यालय पर हुई एक घटना जो लोग भूल चुके हैं, उसे याद दिलाना ज़रूरी है। यह घटना नागपुर केस नंबर 176 के नाम से मशहूर है। अगस्त 2013 को नागपुर की एक निचली अदालत ने 2001 के एक मामले में दोषी तीन आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया था। इन तीनों आरोपियों बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी का कथित अपराध मात्र इतना था कि वे 26 जनवरी 2001 को नागपुर के रेशमीबाग स्थित आरएसएस मुख्यालय में घुसकर गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा फहराने की कोशिश में शामिल थे। संघ इस कोशिश पर इतना तिलमिला गया कि तीनों युवकों पर मुकदमा (केस नंबर 176) दर्ज हो गया और 12 साल तक वो युवक संघ के निशाने पर बने रहे।..आज कालीचरण गैंग तिरंगा यात्रा निकाल रहा है?

इसलिए महात्मा गांधी पर थूंकने का मतलब आसमान की ओर मुंह थूंकने जैसा है। ऐसे सैकडों सवाल हैं जो‌ तब तक जिंदा रहेंगे जब तक सूरज-चांद रहेगा। कालीचरणों यह देश इतनी आसानी से तुम्हारे सामने घुटने नहीं टेकेगा..।