भलाई से पहले धुलाई

नेताजी गरीबों की भलाई करने से पहले विपक्ष की धुलाई करने में विश्वास रखते हैं। न रहेगी बांस न बजेगी बांसुरी। अब नेताओं ने शासन करने का नया ढंग अपनाया है। मीडिया को ललचाकर, बहलाकर, फुसलाकर या फिर धमकाकर अपनी हां में हां मिलाने पर मजबूर कर दिया है। जो मीडिया इसका विरोध करता है उसका जीना दुश्वार हो जाता है। जो नेता बातूनी होते हैं वे लोगों को अपनी मुट्ठी में कर लेते हैं। वह इतना चमत्कारी होता है कि चांद को धरती और धरती को चांद, मिट्टी को पहाड़ और पहाड़ को मिट्टी बनाने की क्षमता रखता है। यह चमत्कार उन्हें झूठ की कला से प्राप्त हुआ है। सामान्यत: लोग झूठ बोलने से कतराते हैं लेकिन इनमें नेतागण कतई नहीं आते और यह परंपरा नेताओं के परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी बदस्तूर चलती रहती है। अगर झूठ पकड़ा गया तो ऐसे-ऐसे बहाने सुनने को मिलते हैं कि सामान्य व्यक्ति आश्चर्य से आंखें फाड़े यही कहता है, ‘‘अच्छा ऐसा भी होता है।’’ अपने स्वार्थ के लिए दूसरे के सत्य की चीरफाड़ कर उसे झूठ में बदल देने में भी हमारे राजनीतिज्ञ माहिर होते हैं-

‘राजा बोला रात है, रानी बोली रात है,

मंत्री बोला रात है, संत्री बोला रात है,

यह सुबह-सुबह की बात है।‘

नेताओं के लिए भाषण की ए,बी, सी, डी, ई जरूर जरूर आनी चाहिए। ए फॉर एक्शन और एरिया यानी आप जिस सब्जेक्ट एरिया के बारे में आप बोलने आए हैं, आपके पास एक्शन प्लान है कि नहीं, जानकारी है कि नहीं, उस एरिया की समस्या और उसका समाधान है कि नहीं। दूसरा बी यानी बोल्डनेस, ये आपके कॉन्फीडेंस का पैमाना है, मंच पर बोलते वक्त आत्मविश्वास से लबालब होने चाहिए। तीसरा सी यानी क्रिएटिव, क्रिएटिवटी बहुत जरूरी है, कुछ जुमले, कुछ शेर, कुछ कविताएं, कुछ जोक, कुछ प्रेरणा देने वाले किस्से आपके दिमाग में हमेशा होने चाहिए, और आपकी क्रिएटिवटी इसमें है कि आप मौके की नजाकत को देख कर फौरन मौके पर चौका मार सकें। डी फॉर डाटा यानी आँकड़ा। जब भी कुछ कहना हो डाटा के आधार पर कहने से बल पड़ता है। और अंतिम है ‘ई’। ‘ई’ का संबंध एनर्जी से है। आप कितने भी अच्छे वक्ता क्यों न हो, कितने ही तथ्य क्यों न जानते हो कितुं आपकी एनर्जी में कमी होगी तो धरा का धरा रह जाएगा। जो नेता इन सब में झूठ का पंचामृत मिला देते हैं, उनकी तो चाँदी ही चाँदी है। वे कामयाब नेता बन जाते हैं।  

चुनाव के समय कतार में खड़े होकर हम जिन नेताओं को चुनते हैं वही नेता जीतने के बाद पैरों पर पैर धरकर हमें जीवन की कतार से बाहर कर देते हैं। इतना होने के बावजूद भी भोली-भाली जनता उन्हीं को चुनती है। उनके सामने विकल्प नहीं है। जनता करे भी तो क्या करें-

‘कागज के इंसानों पर आग की निगरानी है।

अंधे सत्ता के हाथों मासूमों को जान गवानी है।।‘

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657