वो भी क्या दिन थे

प्रिया इंदौर के एक बहुत ही खुले विचारों वाले परिवार से संबंध रखती थी जहां उसकी सभी जरूरतों को उसके कहने से पहले ही पूरा कर दिया जाता था और किसी भी चीज की उसको कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी जाती थी। खूब लाड प्यार और नाजों से पली होने के बावजूद भी प्रिया धरातल से जुड़ी हुई एक सरल स्वभाव वाली लड़की ही थी ।दूसरों की सहायता करना ,कमजोर लोगों के प्रति दया भाव रखना और अपने से बड़े उम्र के लोगों को पूरा सम्मान देना प्रिया की कुछ खास विशेषताएं थी जो उसे आज के आधुनिक युग की लड़कियों से थोड़ा अलग बनाती थी।

समृद्ध परिवार में जन्म लेने के बाद भी प्रिया अपनी सभी सहेलियों के साथ बड़ी ही आत्मीयता के साथ मिलती जुलती थी।उसकी सहेलियों का भी उसके घर आना जाना लगा ही रहता था ।पढ़ाई के सिलसिले में कभी वह उनके घर तो कभी उसकी सहेलियां प्रिया के घर अक्सर आया करती थी ।घर में अनेकों नौकर चाकर होने के बावजूद भी प्रिया हमेशा अपनी सहेलियों के लिए खुद चाय नाश्ते का इंतजाम करती थी और पूरे मान सम्मान के साथ उनकी आवभगत भी करती थी, क्योंकि उसका मानना था कि घर आए मेहमान ईश्वर का रूप होते हैं। उसकी सारी सहेलियां उसके इस व्यवहार से अत्यधिक प्रभावित थी। उनको कभी महसूस ही नहीं होता था कि प्रिया एक रईस खानदान की बेटी है क्योंकि प्रिया उन्हें कभी यह महसूस होने ही नहीं देती थी। प्रिया के माता-पिता और उसके ताऊजी ताई जी प्रिया के इस व्यवहार और उसके स्वभाव से हमेशा अत्यधिक खुश रहते थे। 

प्रिया की एक सहेली साधना के पिताजी किसान थे और खेती बाड़ी का काम करते थे। प्रिया को साधना के साथ उनके खेतों पर जाकर घंटों समय बिताना बहुत अधिक पसंद था। प्रकृति की गोद में शांत वातावरण में प्रिया अपनी रोजमर्रा की भागदौड़ वाली जिंदगी को भूल ही जाती थी ।वह चाहती थी कि उसका आने वाला कल शहर की भागदौड़ और कोलाहल भरी जिंदगी से दूर इसी प्रकार के शांत वातावरण में बीते। 

कुछ ही दिनों बाद प्रिया के लिए शहर के एक बहुत ही अच्छे घर से रिश्ता आया और उसकी शादी तय हो गई। प्रिया के ससुराल वाले शहर के नामी बिजनेसमैन थे। शादी के बाद प्रिया को अपने पति प्रफुल्ल के साथ अमेरिका जाना पड़ा क्योंकि प्रफुल्ल के पिताजी ने अमेरिका में एक नया बिजनेस स्टार्ट किया था जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रफुल्ल के कंधों पर ही डाली गई थी।प्रिया और प्रफुल्ल हमेशा हमेशा के लिए अमेरिका में सेटल हो गए । 

बिजनेस में प्रिया भी अब प्रफुल्ल का साथ देती थी।वहां वे एक दूसरे के साथ बहुत ही कम समय बिता पाते थे क्योंकि उन दोनों की ही अक्सर क्लाइंट के साथ मीटिंग फिक्स रहा करती थी।बिजनेस मीटिंग की वजह से उन्हें एक दूसरे के साथ रहने का मौका बहुत कम ही मिल पाता था।

अमेरिका में रहकर प्रिया को अपने मायके और अपनी सहेलियों की बहुत ज्यादा याद आया करती थी,परंतु सबसे ज्यादा वह उन दिनों को याद किया करती थी जब वह साधना के साथ प्रकृति के सानिध्य में घंटों बिताया करती थी। जब कभी फुर्सत के पलों में उसकी प्रफुल्ल से बात होती तो बातों बातों में अक्सर वह उसके साथ अपने बीते सुकून भरे जीवन के बारे में बात किया करती थी और जिन्हें सुनकर प्रफुल्ल भी बहुत हैरान होता था और अक्सर उसके मुंह से यही शब्द निकलते थे वाह प्रिया, तुम्हारी जिंदगी के वे भी क्या दिन थे!!! प्रफुल्ल की यह बात सुनकर प्रिया की आंखें नम हो जाया करती थी और वह बस हल्का सा मुस्कुरा कर गर्दन हामी में हिला दिया करती थी।

पिंकी सिंघल

दिल्ली