“उदास हैं शहर अब “

खो गई है आत्मा उनकी 

लाए थे कभी जो गाँव से अंकुरित कर 

और रोपण किया था शहर में 

नही रह गई कोई टहनी उस पेड़ पर 

चिटख गया है उसका तना 

नही अब नही निकलते अंकुर उसमें 

अपनेपन के 

और एहसासों के बौर 

प्रेम फुहारों से सिंचित होते थे 

ख़त्म है सभी 

सिमट गए है सभी खुद में 

अब कोई कपाट नही खुलता 

किसी आगंतुक के लिए 

कोई अथिति अब देवता नही होता 

बीमार हो गए सभी नई सोच से 

खिड़कियाँ बंद रहती हैं 

झाँक ना ले पर्दा है हर बात का 

आँगन में खिले फूल भी उदास है 

अब नही होती ख़ुशबू अपनत्व की 

अब नही बटते प्रसाद गली गली 

भय रोग व्याप्त है हर घर आँगन 

छलने लगे है रिश्ते अपने ही 

भूखे को रोटी पानी देना भी 

स्वीकार नही है 

घर की दीवारें ढह गई है 

जिनमें रिश्तों भी पपड़ियों से बन 

झरते जा रहे है 

निर्मल हँसी दांतों के पीछे 

कुंठित छुपी सिसक रही है 

अब नही है मेरे शहर शहर जैसा 

“उदास  हैं शहर अब “

 युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

खो गई है आत्मा उनकी 

लाए थे कभी जो गाँव से अंकुरित कर 

और रोपण किया था शहर में 

नही रह गई कोई टहनी उस पेड़ पर 

चिटख गया है उसका तना 

नही अब नही निकलते अंकुर उसमें 

अपनेपन के 

और एहसासों के बौर 

प्रेम फुहारों से सिंचित होते थे 

ख़त्म है सभी 

सिमट गए है सभी खुद में 

अब कोई कपाट नही खुलता 

किसी आगंतुक के लिए 

कोई अथिति अब देवता नही होता 

बीमार हो गए सभी नई सोच से 

खिड़कियाँ बंद रहती हैं 

झाँक ना ले पर्दा है हर बात का 

आँगन में खिले फूल भी उदास है 

अब नही होती ख़ुशबू अपनत्व की 

अब नही बटते प्रसाद गली गली 

भय रोग व्याप्त है हर घर आँगन 

छलने लगे है रिश्ते अपने ही 

भूखे को रोटी पानी देना भी 

स्वीकार नही है 

घर की दीवारें ढह गई है 

जिनमें रिश्तों भी पपड़ियों से बन 

झरते जा रहे है 

निर्मल हँसी दांतों के पीछे 

कुंठित छुपी सिसक रही है 

अब नही है मेरे शहर शहर जैसा 

सवि शर्मा 

देहरादून