लोल-बकलोल

कैसे बोलूं मधुर-सुमधुर बोल?

जब बोलूं मधुर बोल।

दुनिया समझती बकलोल,

हरदम बनाती लोल।।


कैसे हंसू मधुर-सुमधुर?

जब मैं हंसू मधुर।

दुनिया समझती बकलोल,

हरदम बनाती लोल।।


सामने तारीफ कर,

अपना काम बनाती।

मैं ठगी-सी रह जाती,

बन जाती लोल,

दुनिया समझती बकलोल।।


अब मैंने जाना,

है चतुराई का जमाना,

ना बोलो ज्यादा मधुर बोल,

ना ज्यादा हसो मधुर,

जो जैसा है उसे वैसा निभाओ,

ना दुनिया समझेगी बकलोल,

ना बनोगे तुम लोल।।


प्रियंका त्रिपाठी 'पांडेय'

प्रयागराज उत्तर प्रदेश