महलों के वाशिंदे

महलों के वाशिंदे जब ख्वाब जमीन के देखने लगें

आसमान के परिन्दे जब जमीन के लिए तरसने लगें 

समझ लेना वक़्त आ गया है हकीकत में जीने का 

जूते पाँव के जब खुद के पैरों को ही चुभने लगें 

शनील के बिस्तर भी जब इंसान को काटने लगें 

समझ लेना वक़्त आ गया है हकीकत में जीने का 

बदलने लगे रंग जब इंसान भी मौसम की तरह 

बहने लगे जब खुद के ही जज्बात आँसूओं की तरह

समझ लेना वक़्त आ गया है हकीकत में जीने का 

तराशने लगें जब लोग आपको हीरे की तरह 

ढूँढने लगें जब लोग कमियाँ भगवान की तरह

समझ लेना वक़्त आ गया है हकीकत में जीने का 


वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़