"पेंडुलम"

 हर स्त्री एक पेंडुलम की तरह

 जुड़ी होती है पति नाम की घडी से

 उस छोटे से धुरे के सहारे

जो जोड़कर रखता है

उसे अन देखे विश्वास पर,,,,,, l

वो उस धुरे पर पेंडुलम की तरह

 लटक कर चौबीस घंटे बिना रुके

 बिना थके अपना कार्य करती जाती है,,, l

हाँ! वो बात अलग है

भोजन के नाम पर उसे एक बार

चाभी देनी पड़ती है,, l

आज के युग में चाभी की भी आवश्यकता नहीं, 

बस एक बैटरी ही बहुत है,साल भर चल जाती है,, l

हर नारी नित्य प्रतिदिन अपना कार्य करती जाती है, 

बड़ी खामोशी से,उसी ईमानदारी से, 

 अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर,,l

तब तक किसी को उससे कोई शिकायत नहीं होती

जब तक पेंडलुम की तरह 

घूम घूम के समय दिखाती जाती है,

 अपना कर्म जानकर अपना काम करती रहती है 

और अपने हिस्से का भी समय 

जब दे देती है सबके हिस्से में ,

फ़िर उम्र के चौथे पड़ाव पर आकर

 अगर पेंडलुम घूमना बंद करदे

 तो फेंक दी जाती है,कचरे के डिब्बे में,,

जो घर के द्वार पर रखा होता है

कहीं दूर बहुत दूर,, 

क्योंकि अब वो  उनके किसी काम की नहीं होती,,,

  पुष्पलता ----"पुष्प"