'नारीवाद एक सही विचारधारा'

फ़ेमिनिज़म शब्द को समाज ने गलत विचारधारा का रुप देकर नकार दिया है।

आख़िर कब तक महिलाओं को गलत समझते उनको उनके अधिकारों से वंचित रखेंगे। नारी को स्वतंत्र होना चाहिए ऐसी विचारधारा यानी फ़ेमिनिज़म। अगर स्त्री नारीवादी मानसिकता रखती है तो कोई गुनाह नहीं। क्यूँकि नारीवाद का अर्थघटन समाज इस तरह करता है की स्त्रियों को वो आज़ादी चाहिए जिसकी वो हकदार नहीं, या उन कामों के लिए चाहिए जो इनको शोभा नहीं देती। पर ये बिलकुल गलत है। आज इक्कीसवीं सदी के कुछ मर्दों को भी लगता है कि औरतों को ज़्यादा छूट नहीं देनी चाहिए, थोड़ा सा कंट्रोल उनको काबू में रखता है। या उनको डर है कहीं औरतें उनसे आगे न निकल जाए।

मर्द के कँधे से कँधा मिलाकर चलने में कौनसा पाप है, अगर स्त्री में वो खूबी है जो उसे मर्द से चार कदम आगे ले जाती है तो मर्द के लिए गर्व की बात होनी चाहिए की उनसे जुड़ी स्त्री अपनी पहचान बनाने में सक्षम है। अपनी रक्षा खुद करना, अपने पैरों पर खड़ा रहना, अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद लेना, अपने मन से अपनी ज़िंदगी जीना कोई गलत तो नहीं। पर पहले ये भी समझ लेना चाहिए कि फ़ेमिनिज़म यानी मानसिक स्वतंत्रता और ज़िंदगी अपने तौर तरीके से जीने की आज़ादी। 

अब कोई अठारहवीं सदी तो रही नहीं पढ़ी-लिखी, होनहार महिला दमन और प्रताड़ना का विद्रोह करती है तो उसे फ़ेमिनिज़म कहा जाना चाहिए नहीं की आज़ादी का गलत इस्तेमाल करते जो लड़कियां दारु, सिगरेट, चरस, गांजे का नशा करके छोटे कपड़े पहनकर देह का प्रदर्शन करती है। ये फ़ेमिनिज़म नहीं हल्की मानसिकता और ऐशो आराम के लिए चुने हुए शौक़ मात्र है। 

फ़ेमिनिज़म कोई पुरुषों के ख़िलाफ़ रची गई साज़िश नहीं, नांहि ऐसी कोई विचारधारा जिसे लेकर समाज में हाय तौबा मचाई जाए। अपने हक और अधिकारों की लड़ाई मात्र है। लोकतंत्र देश में इतनी आज़ादी तो सबको मिलनी चाहिए की अपने हक के लिए लड़ना सकें। महिलाओं के सम्मान में पुरुष प्रधान समाज अपनी सोच को इतनी तो सुधार सकते है। जरूरी नहीं इसके लिए महिलाओं के आगे नतमस्तक होते झुक जाए। स्त्रियां मर्दो झुकाना नहीं चाहती, खुद उपर उठाना चाहती है। सिर्फ़ जताना चाहती है की स्त्री भी गौरव और सम्मान की हकदार है। 

स्त्री के भीतर असंख्य हुनरों का स्त्रोत बहता है। उनकी सुजबुझ और ज़िंदगी के प्रति सकारात्मक नज़रिए का सम्मान करते गौरव प्रदान करना मर्दों को खुद की नज़र में उपर उठाता है। दमन करके दबा कर स्त्रियों को पैरों की जूती समझने में कौनसी मर्दानगी है। यहाँ सम्मान देना तो एक तरफ़ कुछ-कुछ लोग बेटी से उसका जन्मसिद्ध अधिकार भी छीन लेते है बेटी के जन्म पर खुशी मनाने का हक तक नहीं देते, मुँह बनाते कहते है लो बेटी हुई। इसिलिए आजकल की पीढ़ी हक मांगने में नहीं छीनने में विश्वास रखती है।

महिलाओं को भी समझना चाहिए की स्त्री सशक्तिकरण मन का होना चाहिए, सोच का होना चाहिए नांकि फ़ेमिनिज़म के नाम पर स्त्री की गरिमा को तार-तार करते बेफ़ाम और बेबाक बर्ताव करते खुद को एक्सपोजर बनाया जाए।आज़ादी उड़ान भरने की मिलनी चाहिए उच्छृंखल बनने की नहीं।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगलूरु, कर्नाटक)