आजकल कहाँ खो गया वो आम आदमी

आजकल कहाँ खो गया वो आम आदमी

गुम सा कहीं हो गया वो आम आदमी


माचिस की तिली हाथों से ढक कर जलाता था

उससे फिर अपनी बीड़ी सुलगाता था

घास की गठरी सिर पर उठाता था

फ्री का लेने से बहुत घबराता था


कहीं भी आना जाना होता था

पैदल ही निकल जाता था

पांव में होती थी टायर की बनी चप्पल

पैबंद लगे कपड़ों में दूर से नज़र आता था


भगवान से जो बहुत डरता था

रिश्तों की बहुत कद्र करता था

खेत में पसीना जो बहाता था

अपने भाईयों के लिए जो मरता था


सुबह से शाम तक जो हल चलाता था

थकाहारा शाम को जब घर आता था

साहूकार से पैसे लेकर चलाता था घर बेशक

तब भी जीने का मजा बहुत आता था


बैंकों से लोन लेने में घबराता था

लिया कर्ज़ समय पर चुकाता था

शर्म हया खुद्दारी दौलत थी उसके पास

सभी के सामने सिर झुकाता था


जितनी चद्दर होती थी उसकी

उतने ही वह पांव फैलाता था

रूखी सूखी खाकर करता था गुज़ारा

अपनी झूठी शान नहीं दिखाता था


बहुमंजिली इमारतें हो गई हर तरफ

इनके आगे अपने आप को बौना समझता है

घास के बिछौने पर आ जाती थी नींद

आज मखमली गद्दों पर नींद को तरसता है


लालच नहीं था उसके मन में 

उसी में जीता था जो था उसके पास

छल कपट से दूर साफ मन था उसका

तंगी में भी नहीं होता था उदास


चाहता है सब कुछ फ्री उसे मिले

कितना बदल गया है अब आम आदमी

आजकल कहाँ खो गया वो आम आदमी

गुम सा कहां हो गया वो आम आदमी 


रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं

जिला बिलासपुर हि प्र