शाश्वत सत्य

एक दिन ये तन तुझे  देगा दगा,

वक्त है अब भी ज़रा मन को जगा।                

फूल के जैसी है तेरी ज़िन्दगी,

चारों तरफा से ये कांटों से घिरी,                             

तोड़कर माली इसे ले जाएगा,

हश्र क्या होगा पता चल जाएगा।                          

इतना क्यों इतराता डाली से लगा,

वक्त है अब भी ज़रा मन को जगा।               

ये बदन भी राख ही बन जायेगा,

एक दिन ये खाक में मिल जायेगा।

कोई झोंका जब उड़ा ले जायगा,

याद भी न तू किसी को आयेगा।

मोह माया से न अब मन को लगा,

वक्त है अब भी ज़रा मन को जगा।              

रिश्ते और नाते सभी झूठे यहां,

बाद मरने के सभी भूले यहां।

साथ बस शमशान तक सब जाएगें,

खाक में तुझको मिलाकर आएगें।

निर्दयी दुनियां से मोह न लगा,

वक्त है अब भी ज़रा मन को जगा।

मंजु मीरां 'सजल' मेड़ता

सिटी,नागौर-राजस्थान 

9784189891