महिलाओं को सशक्त बनना होगा

दुर्गा हो तुम काली हो तुम ही अंबा और भवानी हो

शब्द हो तुम अर्थ भी हो,तुम पूरी खुद में एक कहानी हो

आप और हम प्रतिदिन महिला सशक्तिकरण के बारे में सुनते पढ़ते रहते हैं। अक्सर अखबारों में और पत्र-पत्रिकाओं में यह शब्द कहीं ना कहीं हमारी नजरों के सामने आ ही जाता है और अनायास ही हमारा ध्यान उन पंक्तियों को पढ़ने की तरफ आकर्षित हो जाता है जिसमें महिलाओं से संबंधित कुछ भी लिखा होता है।मेरे साथ तो ऐसा अक्सर होता है।महिला सशक्तिकरण किसी भी समाज को मजबूती प्रदान करता है,समाज को सशक्त बनाता है और जागरूकता पैदा करता है,साथ ही रूढ़िवादी बेड़ियों से समाज को मुक्त भी करता है।सशक्तिकरण महिलाओं में गजब का आत्मविश्वास पैदा करता है और उन्हें आगे बढ़ने हेतु प्रेरित भी करता है।

महिला सशक्तिकरण सुनते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले महिलाओं की मजबूत और सुदृढ़ स्थिति सामने आती है चाहे वह मानसिक हो अथवा सामाजिक या फिर शारीरिक।इसका अर्थ यह भी है कि महिलाएं स्वयं को इतना आत्मविश्वास और शक्तिशाली महसूस करती हैं कि वह स्वयं अपने जीवन के फैसले ले सकती हैं और समाज के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। सशक्त महिलाएं ही एक सशक्त समाज का निर्माण करती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि हमें अपने समाज को,अपने राष्ट्र को आगे लेकर जाना है और समाज में आवश्यक बदलाव लाने हैं तो महिलाओं को सशक्त बनाना होगा और किसी भी सूरत में उन्हें पुरुषों से कम नहीं समझना होगा क्योंकि प्रकृति ने भी खुद स्त्री और पुरुष दोनों को एक जैसा बनाया है और दोनों को एक जैसी शक्तियां भी दी हैं।

परंतु इतना होने के बावजूद भी अभी भी हमारे देश में ऐसे अनेक राज्य हैं जिनमें रहने वाले लोगों की सोच इस तरह की है कि वे महिलाओं को पुरुषों से हर क्षेत्र में कम ही समझते हैं।बेशक हम 21वीं शताब्दी में प्रवेश कर चुके हैं परंतु अभी भी लड़का और लड़की में भेद किया जाता है।लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव भी किया जाता है,महिलाओं का घर और समाज दोनों जगह पर शोषण किया जाता है और उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रख उन्हें आगे बढ़ने से भी रोका जाता है।

व्यवहारिक रूप में देखा जाए तो समाज में आज भी महिलाओं को उतनी स्वतंत्रता और आजादी प्राप्त नहीं हो पाई है जितनी कि पुरुषों को।महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए अनेक प्रकार के कानून भी बनाए गए हैं परंतु जमीनी हकीकत यही है कि उन कानूनों को अभी भी अनेक परिवारों में समाज में तार-तार किया जाता है और महिलाओं को समाज के पुरुष वर्ग के सामने झुकने के लिए मजबूर किया जाता है।

अपने इस आलेख के माध्यम से मैं कदापि यह नहीं कहना चाहती कि पुरुष वर्ग सदैव ही स्त्रियों का शोषण करता है। इसी समाज में पुरुषों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी देखने को मिलता है जो महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ता है और लैंगिक आधार पर किए जाने वाले भेदभाव की खुलकर आलोचना करता है।उनकी इस स्वस्थ,सुंदर और परिपक्व सोच की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है।

जिन लोगों का यह मानना है कि पुरुष सदैव स्त्रियों पर अत्याचार करते आए हैं और उन्हें अपने से कम आंकते आए हैं,उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि पुरुषों से अधिक समाज में,घर परिवार में महिलाएं ही एक-दूसरे के सम्मान पर और अधिकारों पर सबसे अधिक प्रहार करती हैं। महिलाओं का एक बड़ा वर्ग अपने अधिकारों पर होने वाले इन प्रहारों को चुपचाप झेलता है और उनके खिलाफ आवाज उठाने का साहस तक नहीं दिखाता।

एक तरफ जहां आज की नारी अंतरिक्ष में पहुंचकर अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी है, वहीं दूसरी तरफ वही नारी समाज में अपनी दुर्दशा को लेकर सुर्ख़ियों में भी रहती है।

प्रतिदिन सुनने में, पढ़ने में आता है कि आज देश के इस हिस्से में अमुक महिला घरेलू हिंसा का शिकार हुई, आज देश के दूसरे हिस्से में फलां महिला दहेज ना लाने के लिए प्रताड़ित की गई।

जैसा कि पहले भी कहा कि नारी की इस दुर्दशा का काफी साल पहले तक पुरुष प्रधान रहा समाज ही जिम्मेदार ठहराया जाता था। परंतु यदि वर्तमान परिप्रेक्ष्य की बात की जाए तो इस समाज की जगह आज की नारी अपनी दुर्दशा की काफ़ी हद तक स्वयं भी जिम्मेदार है ।अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न होना, जागरूक होने के बाद भी अपने हक की लड़ाई ना लड़ पाना, समाज के सामने आत्मविश्वास के साथ खड़े ना हो पाना आदि। सच मायने में देखा जाए तो 2 औरतें, चाहे उनके बीच कोई भी रिश्ता क्यों ना हो एक दूसरे की दुश्मन बन जाती हैं।वे एक दूसरे की तरक्की बर्दाश्त नहीं कर पाती और हर मौके पर दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करती हैं। यदि समाज में औरतों को उनकी सही जगह पानी है उन्हें पूरा मान-सम्मान पाना है तो पुरुषों से पहले औरतों को अपनी स्वयं की सोच और मानसिकता बदलनी होगी,यही कटु सत्य है।

नित नई ऊंचाइयों पर अब तुमको चढ़ना होगा

तोड़ पुरानी जंजीरों को आगे तुमको बढ़ना होगा

पिंकी सिंघल

अध्यापिका

शालीमार बाग दिल्ली