क्या खोया क्या पाया

यादों के झरोखों से सर्द हवा चली,

ढलते हुये इस साल को उड़ा ले गयी।

क्या खोया क्या पाया की स्मृति में,

आँखों से ओझल हो विदा ले गयी।


कितना भयावह था 2021 का यह साल,

कहीं अपनों के खोने का दुःख कहीं भूख से बेहाल।

कितने हो गये बेघर कोरोना के क्रूर कहर से,

छीन गयी नौकरी कहीं,तो माँ बाप का साया सर से।


मामला कुछ सयंमित हुआ तो लगा सब अच्छा हो गया,

पुनः ओमिक्रोन का दस्तक दिल में दहशत दे गया।

दो साल से दहशत के साये में जी रहा इंसान,

कर खिलवाड़ प्रकृति से नतीजा भुगत रहा इंसान।


इन सब से इतर भी कुछ खट्टे-मीठे अनुभव दे गया,

जाते जाते साल पुराना कुछ रिश्तों से दूरी दे गया।

मिले कुछ नये अभिन्न मित्र भी इस साल,

रंजिशों से इतर सरल और कमाल।


आशा है आने वाला साल देगा खुशियां अपार,

विजय विगुल बज उठेगा होगा न कोई व्यभिचार।

रोगमुक्त,शोकमुक्त हो विश्व हमारा खुशियों से गुनगुनायेगा,

समस्त विश्व वसुधैव कुटुंकम की लौ से जगमगायेगा।


              रीमा सिन्हा

        लखनऊ-उत्तर प्रदेश