वृद्धाश्रम

आज फिर संगीता वृद्धाश्रम के गेट पर अपनी सहेली वीना के साथ खड़ी थी, दोनों के बैग में सबको देने के लिए बहुत कुछ था, एक  लगाव सा हो गया थ। तीन चार महीने में एक बार दोनों ने शहर के बाहर बने इस वृद्धाश्रम में आने का अपना मन बना लिया था।

दूर से ही उन्हें करुणा आंटी दिख गयी जो नाम के अनुरूप ही थी, उन्हें देखते ही संगीता को यू आभास होता था कि रोम रोम में कुछ हो रहा है। एक आदर्श महिला 65 वर्ष के लगभग, जिसका हर शब्द इन लड़कियों को अचरज में डाल देता था। 

आज संगीता पूछ बैठी,"आप यहां कैसे आयी ? 

बड़ी मिन्नत करने पर उन्होंने बताया," मैं शिक्षिका रह चुकी हूं, पर मैं बहुत अभिमानी हूँ किसी की बात मुझे अंदर तक चुभने लगे इससे पहले मैं वहां से भागना चाहती थी मेरी एक सहेली ने मुझे यहाँ का रास्ता दिखाया,  बहु के रोज ताने और जले कटे वचन सुनने की शक्ति नही थी। एक दिन किसी को बिना बताए मैं यहा आ गयी......सब हम उम्र लोगो के साथ अच्छा समय निकल जाता है। अपनो की याद तो बहुत आती है कुछ रिश्तेदारों से पता चला, बाद में मेरे एक पोती भी हुए, अक्सर यहां आते आते संगीता उनको बिल्कुल अपना मानने लगी ।

समय तेज़ी से भाग रहा था वो कॉलेज घर एग्जाम में बहुत व्यस्त हो गयी थी, अचानक एक दिन मां घर मे बाथरूम में गिर गयी पैर में प्लास्टर बंध गया , कामवाली भी काम छोड़ चुकी थी, अब सब काम का भार  संगीता पर था। अब कई दिन वृद्धाश्रम नही जा पाई तो करुणा आंटी ने ही फ़ोन पर हाल लेना चाहा, और संगीता ने अपना हाल बताया और उन्हें मिलने के लिए अपने घर बुलाया जो अब बदल चुका था । 

करुणा आंटी घर आई, आते ही संगीता की हालत देखकर काम मे लग गयी। घर मे और कोई नही था, मां दवा ले के चादर ओढ़े सो रही थी । कुछ देर बाद जब ड्राइंग रूम में दोनों चाय लेकर बैठी तो करुणा आंटी का ध्यान सामने रखी फ़ोटो पर गया, और वो चौक गयी , पूछा, "बेटा ये कौन है।"   

"आंटी मेरे मां पापा हैं।  अरे ये क्या हो गया, ये मेरी ही पोती है, इससे पहले कि आंसू उन्हें भिगोये, उससे कुछ बहाना करके निकल पड़ी........घर के गेट पर ही उन्हें उनका बेटा आते दिख गया , नजर चुरा कर निकलना ही चाहती थी, कि आवाज़ आई "माँ कहाँ चली गयी थी, बहुत ढूंढा आपको।"

"कौन हो, मैं नही पहचानती, मेरा कोई बेटा नही था।"

"माफ कर दो, मां, मेरी नजरें धोखा नही खा सकती।"

करुणा एक करुणामयी मां भी थी, पिघल गयी, और गले लग गयी।

 पीछे से संगीता आके गले से लग गयी अरे वाह आप तो मेरी दादी हैं, अब आप कही नही जाएंगी।

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर