'प्रेम को सहज ले चलो'

पत्ता पीपल का पकने से पहले ही टूटकर शाख से जुदा न हो जाए कहीं 

प्रेम का समुन्दर पी ले चलो इर्ष्या की धूप में सूख कर सहरा न हो जाए कहीं... 

किसी वितरागी मन में मोहब्बत की मेहंदी रचे और,

नम आँखों से जुगलबंदी करते जब होंठों पर पड़ी उदासी खिल उठे 

तब समझ लेना प्रेम ने अपनी बाज़ी जीत ली है..

अस्त हो जाएगा गमगीन सूरज शाम होने से पहले 

तारे उग आएंगे रात होने से पहले..

पंछी लौट आएंगे शाम होने से पहले

 ए कविओं लिखते रहना तुम प्रीत सभर शृंगार रस सजी कविताएँ 

ताकि मटमैले समय के बीच भी ज़िंदा रहे   हरी डाल पर बैठे पंछियों के बीच प्रेम, और सुलगती रहे जवाँ दिलों के भीतर इश्क की चिंगारियां..

 मैं अपनी यादों की लौ थोड़ी और तेज़ कर दूँगी,

मेरे माशूक तुम दौड़े चले आना उस दिन ढ़लते सूरज को साथ मिलकर अर्घ्य देंगे, 

आओगे न..

चलो साथ मिलकर सहज ले विलुप्त होते बिखर रही प्रेम की परिभाषा को।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु, कर्नाटक)