दल निरपेक्षता:शिक्षकों व पत्रकारों के लिए अनिवार्य

आजमगढ़। व्यक्ति के मन,मस्तिष्क और आत्मा के सर्वांगीण विकास की मुख्य कारक शिक्षा तथा लोकतंत्र में गांव गली और दुर्गम स्थलों के निवासियों की समस्याओं को लेकर संसद में जनसामान्य की आवाज तथा जनजागृति की प्रमुख उपागम पत्रकारिता ही यदि राष्ट्र के प्रति निष्ठावान न होकर राजनैतिक दलों का गुणगान तथा अन्यों का विरोध करने की प्रवृत्ति के हमसफ़र हो जायें तो राष्ट्रीयता के मूलमंत्र को जो क्षति होती है,उससे उबरने की सारी जुगत व्यर्थ ही साबित होती है।कदाचित लोकतंत्र के सम्यक सम्वर्धन हेतु शिक्षकों और पत्रकारों का दल निरपेक्ष होना ही सबसे प्रधान आवश्यकता औरकि समय की मांग है,जोकि आज विचारणीय यक्ष प्रश्न है।

    शिक्षा के समाजशास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति का समाजीकरण शिक्षा का एक प्रमुख कार्य है।जिससे वह स्वयम को समुदाय,समाज,प्रान्त और राष्ट्र का अभिन्न अंग मानने लगता है।राष्ट्र का अभिन्न अंग होने की भावना का प्रस्फुटन व विकास ही राष्ट्रीयता की भावना का विकास कहलाता है।शिक्षा द्वारा ही व्यक्ति रंग,रूप,वेश,भाषा,रहन-सहन इत्यादि सभी कारकों का सम्यक ज्ञानार्जन करते हुए सबके प्रति समवेत भाव से उदारतापूर्वक व्यवहार करता औरकि अपने को ढालने का प्रयास करता है।यह स्थिति अनुकूलन कहलाती है।अनुकूलन ही वह स्थिति होती है जो अस्तित्व को बचाने तथा सबको साथ-साथ लेकर चलने की प्रेरणा देती है।इसप्रकार व्यक्ति कक्षा शिक्षण में सभी जातियों,धर्मों व पंथों के विद्यार्थियों के साथ अध्ययन करते हुए समानता तथा समरसता के व्यवहार को आत्मसात करता हुआ भावी नागरिक के रूप में तैयार होता है,जोकि किसी भी राष्ट्र की सुदृढ़ता हेतु परमावश्यक तत्व है।

   शिक्षा की ही तरह उदण्ड मार्तंड से शुरू होकर आज के इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया के साथ-साथ दूरदर्शन व सोशल मीडिया तक प्रचरित पत्रकारिता के विविध रूपों का भी निष्पक्ष व दल निरपेक्ष होना परम आवश्यक है।समाचारपत्र,पत्रिकायें, टीवी,वेब पोर्टल,सोशल मीडिया आदि पत्रकारिता के भिन्न भिन्न रूप होकर भी जनसंचार और जनजागरण के मुख्य स्रोत हैं।जो आज विश्व के एक कोने से दूसरे कोने में पलक झपकते ही अपनी पहुंच रखते हैं।ऐसे में एक भ्रामक और असत्य सूचना का प्रसारण आग से खेलने जैसा होता है।जिससे व्यापक जनधन की हानि और लोगों के बीच मानसिक दुराव बढ़ता है।कदाचित कुत्सित राजनैतिक विचारों से ओतप्रोत पत्रकारों की ऐसी खबरें राष्ट्रीयता के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।जिनसे राष्ट्र की मिलीजुली गंगा जमुनी तहजीब एक नहीं अनेक बार मुश्किल दौर से गुजर भी चुकी है।

    दुर्भाग्य से पहले कल-कारखानों से लेकर शिक्षकों तक तथा अखबारों से लेकर दूरदर्शन तक सभी उपागमों में कार्यरत शिक्षकों व पत्रकारों तथा कार्मिकों के अंदर जिस प्रकार की राष्ट्रीयता की भावना बलवती थी वह आजकल दलीय निष्ठा में बदलती हुई दिखाई दे रही है,जोकि राष्ट्र की एकता के लिए शुभ संकेत नहीं है।पहले कभी दल निरपेक्ष शिक्षकों का एक सङ्घ आज प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक अनेक गुटों में बंट चुका है।लिहाजा आज शिक्षकों के गुट भी शनैः शनैः राजनैतिक दलों की गणेश परिक्रमा करते हुए देखे जाते हैं और दल निरपेक्ष संघ का कोई पुरसाहाल नहीं है।उदाहरण के तौर पर शिक्षक प्रकोष्ठ(भाजपा),समाजवादी शिक्षक सभा,अनुसूचित जाति जनजाति शिक्षक संघ,बहुजन शिक्षक सभा सहित माध्यमिक शिक्षक संघ व महासंघ के विभिन्न धड़े किसी न किसी दल के प्रति राष्ट्र से ज्यादा निष्ठावान दिखाई देते हैं।जिससे कभी दल निरपेक्ष रहा राष्ट्रवादी शिक्षक दिनोंदिन राजनैतिक दलों के जयकारे लगाने लगा है।कदाचित शिक्षकों को दलगत नारे लगाना न तो शोभा देता है और न उनका दायित्व ही उन्हें ऐसा करने की अनुमति देता है।अतः शिक्षकों का राजनैतिक दलों का सदस्य होकर शिक्षण की बजाय राजनैतिक दलों का प्रचार करने से विद्यार्थियों में भी कटुतापूर्ण आचरण का वपन करता है।इसीप्रकार पत्रकार भी राजनैतिक दलों की चाटुकारिता तथा अधिकारियों के चक्कर में अपनी सारी ऊर्जा खर्च करते हुए स्वयम को पावरफुल बताने से संकोच नहीं करते,जोकि निंदनीय कृत्य है।

    दल निरपेक्षता के विषय पर यदि गौर फरमाया जाय तो न नब्बे के दशक तक अखबार और दूरदर्शन जनता की आवाज माने जाते थे।गांवों से लेकर शहरों तक अखबारों की खबरों को सत्यता की कसौटी और प्रमाण माना जाता था।आकाशवाणी समाचार देश के दूरदराज क्षेत्रों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं था।तब पत्रकारों से मिलने हेतु अधिकारियों को जुगाड़ लगाकर भेंट करनी पड़ती थी।अमूमन पत्रकार कभी भी अधिकारियों की परिक्रमा नहीं करते थे।कमोवेश यही हालत शिक्षकों की थी थी।जिनके आंदोलनों से सरकारें  हिल जाती थीं और जनसामान्य शिक्षकों की चरणरज अपने सरमाथे लगाया करती थी।किन्तु आज परिस्थिति बिल्कुल उलट है,आखिर क्यों?यह चिंतनीय है,विचारणीय है।

    वस्तुतः ध्यान देकर सोचने पर तश्वीर साफ झलकती है कि आज के दौर के अधिकांश सम्पादक,पत्रकार और मीडिया हॉउस विज्ञापन के साथ साथ सरकारी पद और राजनैतिक दलों के टिकट पाने की जुगत में रहते हैं।ऐसे में जो पत्रकार निष्पक्ष खबरें लिखना भी चाहते हैं,उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ता है।लिहाजा आजकल समाचारपत्र,टीवी,सोशल मीडिया और वेब पोर्टल झूठ परोसने के साधन और विष फैलाने के उपागम बनते जा रहे हैं।जिससे समाजीकरण विपरीत दिशा में होने से समाज बिखण्डन का शिकार बनता जा रहा है।अतः समाज और राष्ट्र की एकता को पुनः स्थापित करने हेतु पत्रकारों को अपना दायित्व स्वयम समझना होगा।पत्रकारों को निष्पक्ष खबरें ही छापनी और दिखानी होंगी।कदाचित यदि पत्रकार ऐसा नहीं करते हैं याकि इस असफल होते हैं तो यह देश का दुर्भाग्य होगा।

  शिक्षकों के लिए भी कदाचित पत्रकारों की ही तरह आचरण का अनुपालन आवश्यक है।यह बात दीगर है कि पत्रकार व शिक्षक राजनीति में भले ही अपनी किस्मत आजमाएं किन्तु उन्हें राष्ट्रीयता की भावना को क्षति पहुंचाने वाली हरकतों से बचना होगा।शिक्षकों को बतौर शिक्षक निष्पक्षतापूर्वक विद्यार्थियों के साथ बर्ताव करना चाहिए तथा पद और पदवी पाने के बावजूद पत्रकारों को अपनी जिम्मेदारी और दायित्व निर्वहन से विरत नहीं होना चाहिए।इसप्रकार यह कहना शतप्रतिशत सत्य है कि राष्ट्र के सम्यक विकास हेतु जनसामान्य को जागृत करने वाली शिक्षा तथा पत्रकारिता दलगत भावना से ऊपर उठकर की जाने वाली सेवा है।