नक़ाब

ओ नाज़नीन रूख़ से नक़ाब हटा दो,

अपना हसीन रुख़सार ज़रा दिखा दो।

तेरी ज़ुल्फ़ ए मुअत्तर ने माइल किया मुझे,

गिरफ़्त कर उसमें हमें जीना ज़रा सिखा दो।

घायल हैं हम तेरी एक झलक देखकर,

होश आ जाये  चिलमन ज़रा गिरा दो।

बाद ए सबा,बर्ग ए गुल का ख़्वाब हो तुम,

शादाब बनकर आओ,खिज़ां ज़रा हटा दो।

हुस्न ए शबाब, तुम हो हसीं माहताब,

सफ़्हा सफ़्हा पर इश्क ज़रा लिखा दो।

क़ातिल तेरी निगाहें,उसपे कमाल मेहराब ए अबरू,

दूर न रहो,खुद से रू-ब-रू हमें ज़रा करा दो ।

          रीमा सिन्हा (लखनऊ)