मानव की पूंजी

मानव की असली पूंजी बस उसकी मानवता है,

झूठ,फ़रेब और मक्कारी कायरता है।

विमल मन,कंचन काया ईश का वरदान न्यारा,

संस्कार के शिखर पर चढ़कर सफलता का उजियारा।

जात-पात और धर्म से इतर जो इन्हें अपनाते हैं,

सही मायने में सच्चे मानव वही कहलाते हैं।

सत्चरित्र की कुंजी से खुलता देवद्वार का ताला,

परहित का ध्यान रखो, संवारो कल जो आने वाला।

भौतिक सुख की परिधि है,परिवार की पूंजी कल्पद्रुम,

तपते मन के बंजर भू को छाया देती है हरदम।

मात-पिता के आशीष से जीवन होता है सफल,

उनके ही नेह से अस्तित्व बनता है सकल।

सत्य की पूंजी को लेकर मानव तू बढ़ता जा,

घृणा,क्लेश,द्वेष की आँधी से आगे निकलता जा।

मत बनो महामानव पर इंसान तो बन जाओ,

छोड़ हिंसा का दामन वसुधैव कुटुंकम अपनाओ।

                                रीमा सिन्हा

                          लखनऊ-उत्तर प्रदेश