"भारतीय नव वर्ष पर जश्न मनाओ"

आज की पीढ़ी को या तो अपनी संस्कृति और परंपरा का ज्ञान नहीं, या आधुनिकता ने ऐसा लपेटा है की भारतीय प्रणाली और त्यौहारों को छोड़ कर पाश्चात्यीकरण के पीछे दीवाने हो रहे है। हर साल के अंत में आंग्ल तिथि 31 दिसंबर  आती है जिस तारीख से अंग्रेजों का नया साल शुरू होता है। भै उसे हम इतनी उत्सुकता से क्यूँ नाचते-कूदते मनाते है? शायद लोगों को जश्न का बहाना चाहिए होता है। 

अपने समाज के बहुत से लोग और खासकर नई पीढी अज्ञान वश या मानसिक परतंत्रता के कारण, या समाज के वातावरण से प्रभावित होकर के आधी रात में अंग्रेजों की नकल करते न्यू यर पार्टी मनाते है। बड़ी-बड़ी होटेल और रिसोर्ट में पर परशन हज़ार-दो हज़ार से लेकर दस-बीस हज़ार तक खर्च करते नये साल का जश्न मनाते है। सेलिब्रेटीस तो गोआ, मालदीव से लेकर दुबई तक चले जाते है। 

सच में ये हमारा दुर्भाग्य है कि महज़ पैसे कमाने की ख़ातिर होटेल, रिसोर्ट के मालिक अखबारों में विज्ञापन देते हैं, समाज में इस पाश्चात्य अंधानुकरण की वकालत करते है और 1 जनवरी को नव वर्ष मनाने के लिए युवाओं को उकसाते है। और बिना जानकारी के अनुसरण करते सब एक दूसरे को नये साल की शुभकामनाएं देते है। ऐसी पार्टियों की सच्चाई तब सामने आती है जब लड़कियां आवारा तत्वों की गिरी हुई मानसिकता का शिकार बनती है। पार्टी के नाम पर न जानें क्या-क्या होता रहता है। दारू, सिगरेट और शराब से लेकर ड्रग्स जैसी नशीली चीज़ों का सेवन उस रात सबसे अधिक होता है जिसके चलते लड़कियों की इज़्जत के साथ ख़िलवाड भी होता है। ऐसी परिस्थिति में स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की भावना को आगे बढ़ाते हुए नई पीढ़ी को यह बात मजबूती के साथ समझानी चाहिए कि ये हमारा नव वर्ष नहीं है। 31 दिसंबर की आधी रात एवं 1 जनवरी की तिथि न तो विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरती है और ना कोई ऐतिहासिक महत्वपूर्ण तिथि है, जिसे इतना उत्साह पूर्वक मना रहे है इतना अंधानुकरण क्यों? कुछ युवा तो 31 दिसम्बर को ही अपना नव वर्ष समझते है।

समाज को जागरूक करने की जरूरत है कि नूतन हिन्दू नव वर्ष विक्रम संवत् 2079 , युगाब्द 5124 जोकि चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से शुरू हो रहा है वह इस वर्ष 2 अप्रैल 2022 को है, उसको ही हम उत्साह पूर्वक मनाने का सब संकल्प करें तो समाज में सनातन धर्म एवं राष्ट्रीय चेतना का शसक्तिकरण होगा और नई पीढ़ी का अपने नव वर्ष के बारे में ज्ञान बढ़ेगा। पर विडम्बना है कि हमारे समाज में जितनी धूम-धाम से विदेशी नववर्ष एक जनवरी का उत्सव नगरों-महानगरों में मनाया जाता है उसका पच्चीस प्रतिशत हर्ष भी इस पावन-पर्व पर दिखाई नहीं देता। बहुत से लोग तो इस पर्व के महत्व से भी अनभिज्ञ है। आश्चर्य का विषय है कि हम परायी परंपराओं के अन्धानुकरण में तो रुचि लेते है किन्तु अपनी विरासत से अनजान है । हमें अपने पंचांग की तिथियाँ, नक्षत्र, पक्ष, संवत् आदि से प्रायः विस्मृत हो रहे है। जागो हिन्दुओं अपनी परंपरा और संस्कृति को पहचानो।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु, कर्नाटक)