ओमिक्रोन

कोरोना,डेल्टा और अब ओमिक्रोन,

बदल रहा स्वरूप,दहशत ज्यों का त्यों।

क्यों महामारी के अनल में मानव जल रहा?

तरक्की का दम्भ भरकर,इक वायरस से डर रहा।


गति को भी होती है ज़रूरत थमने की,

दौड़ते हुये जीवन को कुछ पल रुकने की।

मृगतृष्णा के इस दौड़ ने हमें कितना पीछे कर दिया,

भूल बैठे थे प्रकृति को,आज प्रकृति ने बदला लिया।


चंद्रमा पर पहुँचे, प्रकाश पुंज को नष्ट किया,

निज करों से मनोरम संसृति को भ्रष्ट किया।

कितना कुछ झेला हमने बीते सालों में,

जाते जाते पुनः मृत्यु की दस्तक दे गया।


भयावह पहली और दूसरी लहर का वह मंजर था,

कोई रोटी को विकल था, कोई महलों में भी जर्जर था।

हे कृष्ण,सुदर्शन चक्र घुमाओ,क्षमा सुधा बरसाओ,

रोक लो इस प्रकोप को,थोड़ी दया दिखाओ।


प्रण हमें अब लेना होगा,मधुर ऋचाओं को समझना होगा।

विपुल,विमल इतिहास हमारा,योग,कर्म से जीतेंगे जग सारा।

सादा जीवन की शैली अपनाकर,प्रकृति को बचाकर,

महामारी के प्रकोप को न आने देंगे दोबारा।


                 रीमा सिन्हा

          लखनऊ-उत्तर प्रदेश