साँझ का दर्द


हाँ मैं साँझ हूँ

ना दिन हूँ ना रात हूँ

हाँ मैं साँझ हूँ।

ना दिन पूरा पाती हूँ

ना रात पूरा पाती हूँ

अधूरी सी इन दोनों

के मध्य में ही रह जाती हूँ।

हाँ मैं साँझ हूँ


मेरे अपूर्ण होने की

भी एक पीड़ा हैं।

ना दिन मेरा हैं

ना रात मेरी हैं।

अधूरा अँधेरा

अधूरा उजास पाती हूँ।

हाँ मैं साँझ हूँ


ना सूरज की रश्मियों संग

जग को जगाती हूँ

ना तारों की छाँव में

निद्रा में ले जाती हूँ।

अधूरी हूँ अधूरा ही पाती हूँ।

हाँ मैं साँझ हूँ


ना सूर्य मेरे संग खेलता

ना चंद्र ही मुझे सजाता

ना रोशनी पूरी पाती हूँ

ना चाँदनी में नहाती हूँ

हाँ मैं साँझ हूँ


ना दिन हूँ, ना रात हूँ

तन्हा सी मैं

अहर्निश के संगम की

सौगात हूँ

हाँ मैं साँझ हूँ


कवयित्री:-गरिमा राकेश गौतम

 कोटा राजस्थान

I d:-garimazerox505@gmail.com