असीम चाहतें

ये चाहते असीम होती हैं

ना सुप्त होती हैं

ना मृत होती हैं।

अनवरत चलता रहता हैं

इनका कारवाँ।

ना अहन देखती हैं

ना निशा देखती हैं।

हर पल मचलती बिलखती

बचपन सी जिद करती हैं।

ये चाहते भी असीम होती हैं।

कभी राई सी होती हैं

कभी नग सी होती हैं।

अनंत अर्णव सी विशाल होती हैं।

ये चाहते भी............।


गरिमा राकेश गौतम

खेड़ली चेचट कोटा 

राजस्थान