मधुशाला

गली-गली और हर नुक्कड़ पर,

बना रहे हो मधुशाला।

मधुशाला प्रियतम तुम जब जाओगे,

बताओ क्या हुआ है संतुष्ट कोई पीने वाला।

गली-गली और हर नुक्कड़,

  पर बना रहे तुम मधुशाला।

बच्चे हैं तेरे राह देखते,

  घर आएगा पिता हमारा।

पी करके तुम जब आते हो,

तब कौन संभालेगा उन्हें बेचारा।

गली-गली और नुक्कड़ पर,

  बना रहे हो मधुशाला।

दारू इतनी पिएगा प्रियतम,

साथ छोड़ तू जाएगा।

कौन तेरी घर गृहस्ती को,

भला संभालने आएगा।

कौन मेरे आंसू पूछेगा,

वक्त हुआ दुखवाला सा।

गली-गली और नुक्कड़ पर,

बना रहे तुम मधुशाला।

घर मेरा हुआ जीण शीर्ण,

छत भी देखो टपक रही।

तू जाता क्यों हैं मधुशाला,

क्या तेरी इसमें शान बड़ी।

घर में तेरे राशन कहां हैं।,

जैसे तैसे घर है चलता।

गली-गली और हर नुक्कड़ पर,

बना रहे तुम मधुशाला।

सुरासुंदरी सबको भाए,

करता नाश तू घर  बाहर।

बात मान जा मेरी सजना,

बर्बाद हुए इसमें कितने घर बार।

गली-गली और नुक्कड़ पर ,

बना रहे तुम मधुशाला।

मधुशाला तो तेरे अंदर,

जहां तू जाता  नहीं मधुशाला।

घर देश राष्ट्र सब बर्बाद कर देगी,

वह ऐसी  है मधुशाला।

गली और नुक्कड़ पर ,

बना रहे तुम मधुशाला।

सृष्टि पूरी सौंदर्य से भरी,

निरखो इसको तुम जाकर।

ढूंढे कहांँ तू मधुशाला,

पहले जिम्मेदारी संभाल तू अपनी,

क्यों नशे में धुत है रहता,

काम ना आए मधुशाला।

गली-गली और हर नुक्कड़ पर ,

बना रहे तुम मधुशाला।

मानव का देखो पतन करें है,

यह तो ऐसी मधुशाला।

घर कैसे बच पाएगा जब ,

जाओगे तुम मधुशाला।

देश कैसे संभालेगा ,

राष्ट्र का पतन करें है मधुशाला।।

खुश तुम होते हो पीकर ,

लिवर किडनी खराब करते।

गिरते पढ़ते रहे झूमते,

होश नहीं तुम खुद का रखते ।

ऐसी मदहोशी में आकर कौन तुम्हें संभालेगा।

लोग तुम्हें कहेंगे शराबी कौन तुम्हें पुचकारेगा।।

'मधु 'तुम्हें है कहती ना जाओ तुम मधुशाला

क्षणिक  आनंद यह देती काम बिगाड़े मधुशाला।।

                        रचनाकार ✍️

                        मधु अरोरा