भारतीय जनतंत्र बनाम भेंड़तंत्र

(26 नवंबर,संविधान दिवस पर विशेष)

लोकतंत्र की परिभाषा जनता का,जनता द्वारा,जनता के लिए अब बेमानी और अप्रासंगिक हो चला है।कारण है-तार्किक चेतना का ह्रास और व्यक्तिगत बौद्धिक क्षमता का गुलाम हो जाना।

 विश्व के सभी विकसित और विकासशील लोकतांत्रिक देशों में राष्ट्र के विकास के नाम पर लोकसभाओं का गठन व सरकारें बनती हैं।व्यक्ति से राज्य और राज्यों से राष्ट्र बनता है अतः डॉ० लोहिया कहा करते थे-  राष्ट्र की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति का उत्थान ही देश के उन्नयन को निर्धारित करता है। 

चुनावी मुद्दों में राष्ट्र के चहुमुंखी विकास संबंधी एजेंडे होते हैं-

 1-देश का आर्थिक विकास

2-देश का GDP कितना है

3-मुद्रास्फीति की दर और आर्थिक विकास

4-राष्टीय रक्षा बजट और विश्लेषण

5-राष्ट्र का शैक्षणिक विकास और बजट में अनुदान

6-चिकित्सकीय विकास,अत्याधुनिक तकनीक में वृद्धि हेतु बजट

7-राष्ट्र के कृषि बजट का लेखाजोखा और समयानुकूल वृद्धि हेतु विशेषज्ञों द्वारा विश्लेषण

8- विदेश नीति और राष्ट्रीय विकास हेतु समझौते

9- युवाओं के शैक्षणिक विकास हेतु अनुसंधान की नई तकनीकों का आयात

10-बालिकाओ के समुचित पोषण व विकास संबंधी राष्ट्रीय नीतियां

11-राष्ट्रीय खेल संबंधी नीतियों पर बहस

ऐसे अनेकों प्रमुख मुद्दे होते हैं जिस पर सरकारें जनता को जवाब देती हैं और जनता प्रश्न करती है।विश्व के किसी भी राष्ट्र में मंदिर और मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारों के निर्माण और उस पर खर्च का मुद्दा विकास के मुद्दों में नहीं शामिल किया जाता। बेरोजगारी,बेकारी, भूख,गरीबी,अशिक्षा आदि संबंधी मुद्दों पर ही चुनाव लड़े जाते हैं और इन्हीं सबंधित आंकड़ों पर विश्व में उस देश का स्थान निर्धारित होता है।

भारत में सबसे प्रमुख व विकराल समस्या है-भ्रष्टाचार। इसे दूर करने का संकल्प सिर्फ चुनावी जुमलों में लिया जाता है उसके पश्चात मुद्दे होते हैं-"गाय,गोबर,मंदिर,दीपक,भत्ता, जातीय समीकरण और डपोरशंखी रूढ़ियाँ"।

भारत में अर्थव्यवस्था व खाद्यान्न की रीढ़ लाखों किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं पर सरकारें मौन? महिला साक्षरता और कुपोषण से बढ़ती उनकी मृत्युदर पर सरकारें मौन?

राष्ट्र के भविष्य युवाओं की बेरोजगारी पर सरकारें मौन?

वैज्ञानिक अनुसंधान पर जारी बजट को उजागर करने की मांग पर सरकारें मौन?

 कई राज्यों में गरीबी व भुखमरी जैसी विकट समस्याओं पर सरकारें मौन? 

विश्व के श्रेष्ठतम विश्विद्यालयों की सूची में भारत 200वें स्थान के नीचे होने पर सरकारें मौन?

राष्ट्रीय रक्षा बजट पर आम चर्चा पर गोपनीयता की आड़ में सरकारें मौन?

चिकित्सकीय अनुसंधान संबंधी राष्ट्रीय बहस पर सरकारें मौन?

किसी भी मद में निर्गत राजकोषीय अर्थ और उसकी उपादेयता की समीक्षा पर सरकारें मौन?

 प्रधानमंत्री कुर्सी पर पंहुचते ही राजनेता प्रधानसेवक व चौकीदार बन जाता है।ऐसा चौकीदार जिसके पांच वर्षों में की गयी हवाई यात्राओं के खर्च का भुगतान सरकारी कोष से हजारों करोड़ में  होता है।सुरक्षा,बैठकों,भोजन,यात्रा, भत्तों,वेतन को मिलाकर प्रतिदिन लाखों में खर्च।लाखों का सूट,लाखों का मशरूम(सब्जी),लाखों की पोशाक, लाखों की कलम रखने वाला गरीब देश का प्रधानसेवक खुद को गरीब परिवार का बताता है।हे ईश्वर ऐसी गरीबी और गरीब चेहरे हर किसी को दे।लालबहादुर शास्त्री जी व मोरारजी को छोड़ यही गरीबी हर प्रधानमंत्री में देखने को मिली है।

राष्ट्रीय आपदाओं में राजकोषीय व विदेशी मदद के संदर्भ में निर्गत लाखों करोड़ का कोई हिसाब नहीं और न ही जनता उसके बारे में रंचमात्र जानती है।

90 के दशक में महाराष्ट्र के लातूर,उस्मानाबाद में आये भीषण भूकम्प और तबाही के बाद देश-विदेश से हजारों करोड़ रुपये की मदद आयी जिसमें कई जिलों का विकास हो सकता था किन्तु तत्कालीन राज्यसेवक शरद पवार जी द्वारा इस मद के संदर्भ में मुंह ही नहीं खुला।यही हाल परवर्ती सरकारों का भी रहा है।

 चर्चा,बहस,समर्थन,विरोध,टकराहटें,आंदोलन यदि होते भी हैं तो राजनेताओं के सुरक्षित भविष्य को लेकर।जनता द्वारा किये जा रहे हक के लिए आंदोलनों की आवाजें सत्ता के हरम में हो रहे राजनीतिक नृत्य के घुंघुरुओं और तबले की थापों में दब जाती हैं अथवा दबा दी जाती हैं।पांच वर्ष बाद पुनः घी चुपड़ी रोटी के टुकड़े जनता की ओर फेंकी जाती है और इस रोटी के साथ दाल,भात,तरकारी मिलने की लालच में जनता इन दोगलों के सिर पर पुनः लोकतंत्र का ताज रख देती है।

 यही है-भारतीय लोकतंत्र। मंदिर,मस्जिद,गिरजे,गुरुद्वारे बनाना तो सरकारों के लिए चंद दिनों का कार्य है लेकिन इन मुद्दों को जिंदा रख अन्य मुद्दों को जमींदोज कर दिया जाता है जो राष्टीय राजनीति व देश के स्वस्थ लोकतांत्रिक विकास हेतु श्वसनतंत्र सरीखे हैं।

आज लोकतंत्र किसका,किसके द्वारा और किसके लिए है-ईश्वर ही बता सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख के  बयान -"कानून से समाज नहीं चलता"... ने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नए प्रश्नचिन्ह जरूर खड़े कर दिए हैं।बिना कानून तो कुछ भी नहीं, जंगलराज का भय मन में सिहरन अवश्य उत्पन्न करता है।

हाँ इतना जरूर है कि -"रामलला हम आएंगे,मंदिर वहीं बनाएंगे " जैसे गगनभेदी नारों को सुनकर #विकसवा पेड़ पर चढ़ गया है और भोली-भाली जनता को अगले पंचवर्षीय योजना में सत्ता द्वारा फेंकी गयी रोटी के साथ मिलने वाली तरकारी,दाल,भात व पनीर को कल्पनालोक में दूर से निहार रहा है।

    अभी बस इतना ही कि-

   "जिंदा जिस्म की कोई अहमियत नहीं;

   मजार बन जाने दो,मेले लगा करेंगे"।

अंजनीकुमार सिंह

अवध (उ.प्र.)