आओ खेलें उनके साथ

आओ बाल दिवस मनाए, 

हम भी थोड़े बच्चे बन जाए।


खूब खेले उनके साथ

ना नाराजगी ना हो डांट।

उनकी उदासी को जाने 

उनकी शैतानी को पहचाने। 

हम तो बहुत बड़े हो गए 

भूल गए बचपन की बात,

आओ खेलें उनके साथ।


इतनी छोटी उनकी खुशियां

मुट्ठी में उनके हैं दुनिया,

पल में रोते पल में हंसते

वो नहीं पास तो दिन है रात,

आओ खेलें उनके साथ।


थोड़ा उनके जैसा ही

हम भी निर्मल हो जाएं,

थोड़ा उनके जैसा ही 

सच्चे, भोले हो मुस्काए,

जैसे वो जीवन को जीते 

हम भी जी लें उनके साथ, 

आओ खेलें उनके साथ।


मात-पिता ना पहचाने 

तो क्या दुनिया पहचानेगी,

हम उनका दर्द ना बाटे 

तो क्या दुनिया बांटेगी,

माता-पिता से बढ़कर 

ना कोई संगी साथी 

मात पिता उनके जीवन के

है सच्चे दीपक बाती।


बचपन भी न मुस्काया तो

तो क्या जीवन मुस्काएगा,

इसीलिए उनके हिस्से की 

सारी खुशियां हो आजाद,

आओ मिल खेलें उनके साथ।


अंजनी द्विवेदी (काव्या)

देवरिया उत्तर प्रदेश