सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों को वापस लेने से किसानों को क्या फ़ायदा?

सरकार क्या जगत के तात की दुश्मन है जो कृषि कानून से किसानों को बर्बाद करेगी? जब मोदी सरकार ने शपथग्रहण किया था तभी किसानों को उपर उठाने की बात कही थी। आज भी बिना किसीको दोष दिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते सरकार ने किसानों की बात का मान रखा। पर ज़रा कृषि कानून पर नज़र डालेंगे तो पता चल जाएगा की ये कानून सच में किसानों के हक में था। 

कृषि कानून का लंबे समय से विरोध चल रहा था ऐसे में पीएम मोदीजी ने आज साफ कर दिया है कि केंद्र इन तीनों कानूनों को वापस ले रहा है।

केंद्र सरकार ने किसानों को देश में कहीं भी फसल बेचने की स्वतंत्रता प्रदान की है, ताकि राज्यों के बीच कारोबार बढ़े। जिससे मार्केटिंग और ट्रांस्पोर्टेशन पर भी खर्च कम होगा।

पहले देखते है कि इस बिल में सरकार ने किसानों के पक्ष में क्या प्रावधान रखे थे। इस कानून में किसानों पर राष्ट्रीय फ्रेमवर्क का प्रोविज़न किया है। यह बिल कृषि पैदावारों की बिक्री, फार्म सर्विसेज़, कृषि बिजनेस फर्मों, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और एक्सपोर्टर्स के साथ किसानों को जुड़ने के लिए मजबूत करता है। कांट्रेक्टेड किसानों को क्वॉलिटी वाले बीज की सप्लाई करना, तकनीकी मदद और फसल की निगरानी, कर्ज की सहूलत और फसल बीमा की सहूलत मुहैया कराई गई है। साथ ही अनाज, दाल, तिलहन, खाने वाला तेल, आलू-प्‍याज को जरूरी चीजो की लिस्ट से हटाने का प्रावधान रखा गया है। जिससे किसानों को अच्छी कीमत मिले।

पर कृषि कानून वापस लेने का कारण बताते पीएम मोदी ने कहा कि हम किसानों को समझा नहीं सके इसलिए इन कानूनों को वापस ले रहे है। कृषि कानून को बिना समझे बिना जानें विद्रोह की मशाल लेकर निकल पड़ते है, यह बहुत ही दुःखद है। कुछ सिरफिरों और देश को बांटने वालों के बहकावे में आकर नये कृषि कानून रद्द कर दिए गए है। इन कृषि कानून का महत्व नौकरी के लिए दूसरे शहर में बस गये लोगों को बखूबी मालूम था, जो खेती के लिए समय से घर नहीं आ पाते थे। कृषि कानूनों को वापस लेना सिर्फ़ एक खराब निर्णय ही नही बल्कि शर्मनाक भी है। देश के छोटे व गरीब किसानो के लिए आज काला दिन माना जाएगा।

छोटे किसानों के कल्याण के लिए, देश के कृषि जगत के हित में, देश के हित में, गांव गरीब के उज्जवल भविष्य के लिए, पूरी सत्य निष्ठा से, किसानों के प्रति समर्पण भाव से, नेक नीयत से ये कानून लेकर आई थी। लेकिन इतनी पवित्र बात, पूर्ण रूप से शुद्ध, किसानों के हित की बात, सरकार के प्रयासों के बावजूद कुछ किसान समझ नहीं पाए। कृषि अर्थशास्त्रियों ने, वैज्ञानिकों ने, प्रगतिशील किसानों ने भी उन्हें कृषि कानूनों के महत्व को समझाने का भरपूर प्रयास किया। 

सरकार किसानों के कल्याण के लिए, खासकर छोटे किसानों के कल्याण के लिए, देश के कृषि जगत के हित में, देश के हित में, गांव गरीब के उज्जवल भविष्य के लिए, पूरी सत्य निष्ठा से, किसानों के प्रति समर्पण भाव से, नेक नीयत से ये कानून लेकर आई थी।

सरकार की पहल से कृषि उत्पादन में वृद्धि ही हुई है। ग्रामीण बाजारों को मजबूत किया है। छोटे किसानों की मदद के लिए कई योजनाएं बनाई गई है, जिसकी जानकारी लेकर किसानों को फायदा उठाना चाहिए। किसानों के लिए बजट आवंटन पांच गुना बढ़ गया है। हमने सूक्ष्म सिंचाई के लिए भी धन दोगुना कर दिया है।  हजारों किसान, जिनमें से ज्यादातर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के है जो दिल्ली के कई सीमावर्ती जगहों पर कृषि कानून  के विरोध में आज भी डेरा डाले हुए है। तीन कृषि कानूनों को पूरी तरह से निरस्त करने और अपनी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानूनी गारंटी की मांग कर रहे है। ऐसे में सरकार उन्हें समझाने में असमर्थ रही है। प्रधानमंत्री खुद झुके लेकिन देश को झुकने नही दिया , वरना एक सरकार ऐसी भी थी जो इमरजेंसी लगा कर जेलों में बंद करने वाले काम भी करती थी। हमारे देश की प्रजा को हर छोटी बड़ी बात पर बिना सोचे समझे विद्रोह करने की आदत पड़ गई है।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु, कर्नाटक)