उलझन

जिधर भी देखो उलझन में हैं सारे

सभी इस बीमारी से हैं परेशान

जकड़ रखा है पूरे समाज को इसने

ढूंढा बहुत नहीं निकला कोई समाधान


सुबह उठते हैं रोजी रोटी की चिंता सताती है

बच्चों की फीस की उलझन सामने आती है

महंगाई से घर चलाना हो रहा मुश्किल

रोटी दाल भी मुश्किल से मिल पाती है


नल लगा है पानी नहीं आता

कितनी बार शिकायत करवाई

जूते घिस गए दफ्तर के चक्कर काटते

पर बाबू को यह बात समझ नहीं आई


जिंदगी गुजर गई उलझनों को सुलझाते

एक उलझन दूसरी को बुला लेती है जाते जाते

कोई बच्चों से तो कोई बीमारी से है परेशान

कई जानबूझकर उलझन को हैं बुलाते


उलझनें सब पर पड़ी हैं भारी

ऐसे ही कट जायेगी यह ज़िन्दगी सारी

उलझ गया जो उलझनों से मुकाबला किया

उसी ने ज़िन्दगी में है बाजी मारी


रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं

जिला बिलासपुर हि प्र