गर्मी आ गयी

रजाई में बैठी सुनीता अदरक और तुलसी वाली गर्मागर्म चाय की चुस्कियां ले रही थी। साथ ही साथ फोन देख रही थी सोचा सबसे पहले स्टेटस डालूं,।साथ ही दूसरों के भी स्टेटस चेक करने लगी। सबके जाने के बाद रसोई से निपट कर अभी फ्री हुई थी और नहा कर अपनी चाय ले कर  कुछ देर आराम  करने के मूड में बिस्तर में  आ गयी थी। इस समय मन करता है कि थोड़ी देर धूप में बैठे लेकिन तीन दिन से सूरज देवता का कहीं नामोनिशान नज़र नही आ रहा था और ठंड का प्रकोप भी अब कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। 

चाय पीकर मग रखने को उठी तो उसको लगा कि पैर अभी भी गर्म नही हुए तो सोचा पहले जुराबें पहन लूं। पैरों से उसको कुछ ज्यादा ही ठंड चढ़ती है। जुराबें पहन कर पैर फिर से रजाई के अंदर कर लिए और फोन देखने के लिए उठाया था कि दरवाज़े की घण्टी बजी,"ओफ्फो,अकेले बन्दे का भी कोई हाल होता है एक तो ठंड इतनी ज्यादा है कि पैर बर्फ में लगे पड़े है।ऊपर से पांच मिनट रजाई में बैठना भी नही मिलता।बार बार उठ कर देखना पड़ता है कि गेट पर कौन है…!!!

बड़े बेमन से उठ कर गयी तो देखा काम वाली बाई की बारह साल की बेटी थी। अब ये क्यों आ गयी।पक्का आज फिर से इसकी माँ का कोई नया बहाना होगा..काम ना करने का..!!

"वो आंटी आज मेरी मम्मी को बहुत तेज बुखार है इसलिए आज मम्मी ने मुझे भेजा है काम करने को"वो बोली।

"तेरे से हो पायेगा झाड़ू पोछा?

और बर्तन भी तो करने हैं न"

"हांजी आंटी जब मम्मी कोठियों में काम करने जाती है तो पूरे घर का काम मैं ही संभालती हूं।"उसने बोला

और सुनीता हैरानी से उसको देख रही थी कि वो पतले से सूती सलवार सूट के ऊपर एक पतला स्वेटर ही पहने हुए थी और कैसे नंगे पैर पूरे घर मे रगड़ रगड़ के पोछा लगा रही थी क्योंकि चप्पल तो वो शायद बाहर ही निकाल कर आई थी।

आखिरकार जब उस  से रहा नही गया तो वह उठी और अलमारी से पांच छे जोड़े जुराबों के निकाले और एक उसके हाथ में दे कर बोला ,"ये पकड़ बिटिया पहले ये जुराबें पहन और ये बाकी की जुराबें घर ले जाना और हमेशां पहन कर रखना।"

जुराबों को पहन कर उसके चेहरे पर एक निश्छल सी मुस्कान आ गयी थी और उस मुस्कान को देख कर सुनीता को अजीब सा सकून मिला था। उसके जाने के बाद वह वापिस जब रजाई में आई तो लगा कि अब पैरों की ठंडक खत्म हो गयी है और रजाई में गर्मी सी महसूस होने लगी है।

मौलिक एवं स्वरचित

रीटा मक्कड़

लुधियाना