अंत के बाद भी..

सुनों कविताओं..

हो सकता है

इस डिजिटल युग में

तुम्हें अपमानित भी होना पड़े ,

पर, याद रखना

सिर्फ बादलों के गरजने से

नहीं खिला करते कभी फूल

वो अपलक इंतज़ार करते हैं

"बारिश" का !!


सुनों.. तुम तो वो बारिश हो

जो कि

फिर से हरा कर देगी

थकी हुई सभ्यताओं को

चिलचिलाती धूप में भी..

नहीं सूखने दोगी उसकी जड़ों को..

प्राण बनकर सदैव सांस लेती रहोगी

अंत के बाद भी !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश, मेरठ