॥ अन्नदाता ॥

हे अन्नदाता तुम्हें सहस्त्रों प्रणाम

तेरी जीवन यात्रा को मेरा सलाम

किसानों की सुन लो कोई पुकार

दिल्ली में बैठा जनता की सरकार


सुबह सूरज जब पूरब आता है

हल बैल ले खेत चला जाता है

धूप शीत हो या हाे   बरसात

मिहनत करता है    दिन रात


दोपहर भोजन तूँ है    लिया

खेतों की मेड़ पर जीवन है जिया

नहीं तुम्हें बिस्तर की   आराम

तेरे चरणों में  उदय  का सलाम


पर्णकुटी में डाला तूँ है डेरा

अंधियारी रात हो या हो सबेरा

तम्हें फिक्र नहीं घर जाने की

चिन्ता है सिर्फ फसल बचाने की


महाजन के चंगुल में जब फँस जाता

मूलधन से दो गुणा व्याज चुकाता

सबका पेट जब तूँ भरता   है

फिर जग में कष्ट तूँ क्यों सहता है


किसी को चिन्ता नहीं है तेरी

अरमान दफन है जमीं पर सारी

लंगोंटी है तेरी मात्र पहनावा

खेतों की मिट्टी है तेरी काशी कावा


फटेहाल जिता है तूँ अपना जीवन

बच्चे के पैंट में लगा है कई पेवन

अंगूठा छाप बन कर तूँ रह जाता

बच्चे को भी तूँ पढ़ा नहीं पाता


जग नहीं समझता है तेरी दुखड़ा

अन्दर से रोता है तेरा   मुखड़ा

सरकार भी तेरी कभी ना सुनता है

तेरी प्रति सदा आँख मूँदता है


कौन सुने अन्नदाता की पुकार

जागो जागो ओ दिल्ली की सरकार

पालनहारा जब जग में  रोता  है

इनकी दुःरवड़ा तूँ क्यूं नहीं सुनता है


इनकी फसल का उचित मूल्य दिला दो

इनकै बच्चे को शिक्षित भी बना दो

दुःखड़ा सुन लो ओ राज दरबार

भाग्य पलट दो खेती का इस बार


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

9546115088