'कुछ भी नहीं बदला'

बंदीशों की आदी कुछ स्त्रियां नखशिख अपना लेती है दहलीज़ के भीतर की सीमित दुनिया..

 तिश्नगी चरम पर होती है बेशक आसमान  को बाँहों में भरने की..

 लहू में बसी रस्मों रिवाज़ की बेड़ियां इज़ाजत कहाँ देती है आज़ादी को छूने की..

उसके लिए ज़िंदगी एक बंद किला है जिसमें रोशनी महसूस करना मना है

बस दूर दूर तक तमस का साम्राज्य फैला है..

नहीं खुलेंगे पितृसत्तात्मक वाली सोच के जंक लगे किवाड़ और खिड़कियां उन औरतों के लिए कभी..

मुखर होते उजली सदी की भोर में सुकून की साँसें लेना उनकी लकीरों में नहीं..

कुछ स्त्रियों के लिए कुछ भी नहीं बदला ससुराल कहते है जिसे वह जगह जहन्नुम का दूसरा द्वार होता है..

उस जहन्नुम के भीतर सिसकियाँ पनपती है, वेदना का सागर बहता है और एक मासूम के सपनों की चिता अखंड जलती रहती है..

उस चिता में होमे जाते है प्रताड़ना के समिध, एक स्त्री के अरमान, आँसू रुपी घी और एक ज़िंदगी जिसे कभी आज़ादी रुपी मोक्ष नहीं मिलता...


भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु, कर्नाटक)