श्रीमती राजेश्वरी पॉल अन्तर विद्यालय हिन्दी वाद विवाद प्रतियोगिता का हुआ आयोजन

नोएडा : एपीजे स्कूल नोएडा के माध्यम से ज़ूम मीटिंग द्वारा श्रीमती राजेश्वरी पॉल अन्तर विद्यालय हिन्दी वाद विवाद प्रतियोगिता का बेहद ही सफल आयोजन किया गया जिसमें 17 स्कूलों के 34 बच्चों ने भाग लिया और विषय: "कड़े कानून का डर समाज में बदलाव का सकता है" पर पक्ष और विपक्ष में अपने विचार प्रस्तुत किये। हमारी खुशकिस्मती रही की निर्णायक मंडल में हमें शामिल होने का सुअवसर प्राप्त हुआ और सभी बच्चों के तर्क वितर्क सुनने का अवसर मिला। अच्छा लगा की बच्चों में  इतनी जागरूकता है कानून के प्रति और वो उसके अच्छे बुरे हर पहलू से भली भांति अवगत भी हैं। 

जैसे सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही कड़े कानून समाज के लिए सही भी हैं नहीं भी इसके हर तर्क और वितर्क से सभी बच्चों ने बखूबी अवगत कराया। कानून की परिभाषा जानना , समझना ही ज़रूरी नहीं उस पर अमल करना भी आवश्यक है। कड़े कानून न हों तो जंगल राज जैसी स्थिति होगी जैसे जंगल में पशु खुलेआम बिना नियंत्रण के घूमते रहते हैं वैसे ही अपराधी  बेखौफ अपराध करते रहेंगे।

साथ ही ये बात भी सही है की नैतिक मूल्य थोपे नहीं जा सकते और नैतिक मूल्यों का स्थान कानून नहीं ले सकता। इसके लिए समाज की मानसिकता को बदलना होगा हर व्यक्ति को दिल से खुद के अंदर से अपनी सोच और विचारों से बदलाव लाना पड़ेगा न की किसी डर,  दबाव या लागू किये गए कानूनों से। कानून विवेक की युद्ध सामग्री न बनें अपितु नैतिकता ही वो नींव है जो समाज की तस्वीर बदल सकता है। ठीक उसी तरह हमारी सरकारों को भी कोई भी अधिनियम को लागू करने से पहले खुद पर अमल करना होगा। जैसे एक माँ अपने बेटे की मीठे की लत छुड़ाने गाँधी जी के पास गई तो गाँधी जी ने 15 दिन बाद आने को कहा। 15 दिन बाद जब बेटा और माँ लौट कर आये तो उन्होंने पूछा आपने 15 दिन बाद क्यों बुलाया तब  गाँधी जी ने कहा पहले मैं अपनी आदत छोड़ता तभी तो आपके बेटे को कहता। इसी तरह पहले सरकार खुद पर अमल करे तभी आम जनता से उसके मानने की उम्मीद करे । उसी प्रकार माना की काननू अंधा होता है उस की आँखों पर सफेद पट्टी बंधी होती है पर न्याय को इतना विलंब भी न करें की वो अन्याय लगने लगे या चंद लोगों के हाथों की कठपुतली बन जाए जिसे वो जैसा चाहें तोड़ मरोड़ सकें। कानून भले ही अंधा होता है पर काननू बनाने वाले तो नहीं जिन पर कभी नोटों की कभी दबाव की पट्टी बंध जाती है। कानून से कानून व्यवस्था कड़ी होनी चाहिए तभी समाज में किसी बदलाव की अपेक्षा की जा सकती है। तभी समाज में फैली कुप्रथाएँ, दहेज उत्पीड़न, यौन शोषण, बलात्कार, मानव तस्करी , एसिड अटैक, रंग भेद, लिंग भेद, भ्रूण हत्या, जातिवाद आदि। जब तक हम खुद को खुद की सोच को नहीं बदलेंगे तब तक कैसे इन अत्याचारों पर रोक लग पाएगी। और सही लोगों को सज़ा न मिले वो अपनी ताकत , पैसे, नाम के बल पर बचते रहें और मासूम बिना गुनाह के सज़ा भुगते ये भी तो सही नहीं। जैसे कोई भूख को शांत करने के लिए मजबूरी में ब्रेड या रोटी चुराए तो या तो लोगों की भीड़ उसे मार मार कर अधमरा कर देगी या पुलिस डंडे मार मार उसे जेल में डाल देगी। वहीं बलात्कारी, हत्यारे, माफिया आदि खुलेआम घूमते रहें ये तो सही नहीं न।

कानून की आड़ में जो अत्याचार किया जाए उस से बड़ा अत्याचार कोई नहीं या अपराध होने के बाद उसका समाधान खोजना भी सही नहीं। 

हम सभी ने देखा, सुना, पढ़ा निर्भया केस में कितनी दरिंदगी के बाद गुनहगार सज़ा से सालों साल बचते रहे एक को बतौर नाबालिग बख्शते रहे वहीं मासूम ने तड़प तड़प के अपनी जान गंवा दी और लाचार माँ सालों साल न्याय की गुहार लगाती रही और न्यायालय के चक्कर काटती रही। वहीं नीरव मोदी हो या विजय माल्या या अन्य बड़े व्यापारी जो देश को लाखों करोड़ों का चूना लगाकर विदेशों में बैठे हैं उनका न सरकार कुछ कर सकी न कानून। कानून जहां दिशा निर्देश लागू करती है वहीं उसे गतिशील होना भी आवश्यक है ताकि कानून भय का तत्व या अराजकता की स्तिथि न पैदा करे ये एक शुद्ध वायु की तरह हो जिस में खुल के सांस ली जा सके। कानून से कानून व्यवस्था कड़ी हो और अगर हमारी हिफाज़त का दावा , वादा करते हैं तो सही समय पर नदारद न हो जाएं। जैसे कोरोना काल में भी देखा गया एक तरफ लोग दम तोड़ते रहे वहीं लोग दुगने चौगने दामों पर दवाएं बेचते रहे बिना किसी रोक टोक के। सुधार अपने अंदर से हो न की डर और दबाव से क्योंकि अपराधी लोग तो कोई न कोई  तोड़, तरीका ढूंढ ही लेते हैं सज़ा से बचने के लिए और निर्दोष फंस कर रह जाते हैं । इसलिए हम सभी को अपने अपने मन से कड़ा और अडिग होना पड़ेगा तभी सभय समाज का निर्माण हो सकेगा और शांतिपूर्ण जीवन का निर्वाह।

इस सुन्दर आयोजन का श्रेय जितना प्रतिभागियों को जाता है उतना ही आयोजन के तीनों सूत्रधार एवं प्रधानाचार्य ए. के .शर्मा जी , उप प्रधानाचार्य अमृता हजेला जी  , रूबी भटनागर जी व हिन्दी विभाग के सभी अध्यापकों को एवं हमारी सहभागी ज्यूरी श्वेता रश्मि को।


ज्यूरी प्रतिभागी

डॉ मीनाक्षी सुकुमारन

नोएडा