पूजते हैँ उन पत्थरों को


पूजते हैं उन पत्थरों को  भी

जिन्हें कभी तराशा ही नहीं हमने

कोई लालच या अंधविश्वास नहीं

सच्चाई है उनमें सच हममें रहता है

प्रतिभा हर शख्स में होती है पर

सबको मौका नहीं मिलता दिखाने का

कुछ तराशना चाहते हैं खुद को

पर कुछ बनते हैं  रोड़ा

नारी मुक्ति की बात होती यहां

पर राक्षस का कहाँ बध होता है

आज का अर्जुन पहले वाला नहीं

वह बदल चुका है स्वार्थ हेतु

गऊओं को कहते मुक्ति दायिनी

फिर भी क्यों कष्ट वे सहतीं

आज प्रेम खिसकता जा रहा है

नफरत दिलों की रानी बन रही है

हम उस सच को पूजें जो मूर्त नहीं

जिसे हम महसूस कर सकें

क्योंकि चेहरों पर लिखा हुआ

कुछ नहीं होता समझना पड़ता है

पूज ते हैं उन पत्थरों को भी

जिन्हें कभी तराशा ही नहीं हमने

पूनम पाठक बदायूँ

इस्लामनगर उत्तर प्रदेश