नाटकों, रंगमंच, थियेटर और साहित्योत्सव को पुनर्जीवित करना समय की मांग - सरकारी संरक्षण, निजी संगठनों, निजी टीवी चैनलों, नागरिक समाज को आगे आने की ज़रूरत

समाज में व्याप्त कई बुराइयों, भेदभावपूर्ण प्रथाओं से उबारने, जागरूकता लाने तथा वर्तमान आधुनिक अभियानों का लाभ पहुंचाने में नाटकों, रंगमंच, थिएटर की महत्वपूर्ण भूमिका - एड किशन भावनानी

गोंदिया - भारत को आदि-अनादि काल से ही संस्कृति, सांस्कृतिक, साहित्य और नाटकों का अनमोल गढ़ माना जाता है। जो हजारों वर्षों से भारत में परंपरा चली आ रही है परंतु पिछले एक-दो दशकों से हम देख रहे हैं कि पाश्चात्य संस्कृति युवाओं पर भारी होते जा रही है। हजारों वर्ष पूर्व की संस्कृति को पुराना ज़माना कहकर नज़रअंदाज किया जा रहा है और इसे अपनाने वालों को ओल्डमैन का दर्ज़ा देकर किनारे करने की प्रथा चल पड़ी है। क्योंकि हर किसी को नए ज़माने के अनुसार पुरानी टॉकीजों को छोड़कर मॉल आधुनिक थिएटर, होम थिएटर और नजाने क्या-क्या हिसाब से आधुनिक नई पिक्चर देखना होता है। जिसका प्रभाव यह हुआ है कि पुराने ज़माने के नाटकों, रंगमंच, थियेटर, साहित्य के दर्जे का सिकुड़ना शुरू हो गया है और हम देख रहे हैं कि इनकी स्थिति विलुप्तता की ओर जाने लग गई है!! साथियों इन्हें हम बचाने की करें तो अभी भी देर नहीं हुई है!! सरकारी संरक्षण, निजी संगठनों,निज़ी टीवी चैनलों, नागरिक समाज आपस में तालमेल कर मिलकर जिलास्तर पर प्रशासन के सहयोग से इस साहित्य को पुनर्जीवित करने की ज़रूरत है। क्योंकि भारत के अधिकतम गांवप्रदान वासी इस पुराने साहित्य की भाषा जल्दी समझते हैं। क्योंकि यह आमने-सामने, सजीव चित्रण होता है कोई दिखावा या डिजिटल कमाल नहीं होता!! प्योर सच्चाई पर आधारित होता है!! साथियों बात अगर हम आज सामाजिक लेवल पर व्याप्त बुराइयों दहेज प्रथा, सती प्रथा, जादू टोना, बलि प्रथा इत्यादि अनेक प्रथाओं को मिटाने की करें तो यह नाटक, रंगमंच, थिएटर और साहित्य समाज परिवर्तन का अचूक अस्त्र है। जिसकी भाषा गांव वासी जल्दी समझते हैं और यह सदियों से चला आ रहा है। साथियों बात अगर हम पिछले बीते कुछ सालों से अभी तक किसी आंदोलन या अभियानों में नाटकों, रंगमंच की करें तो हम ग्राउंड लेवल पर या टीवी चैनलों के माध्यम से देखते हैं कि कई आंदोलन, सरकारी अभियानों को नाटकों के द्वारा रोड पर प्रस्तुति देकर लोकप्रिय बनाया जाता है और जनता बड़े उत्साह और जोश से उन नाटकों को रोड पर या टीवी चैनलों पर ग्राउंड रिपोर्टिंग देखते हैं। साथियों मैं खुद ऐसे अनेक नाटक टीवी चैनलों पर देख चुका हूं और मुझे पूरा विश्वास है इन नाटकों, रंगमंच थियेटरों को जोर-शोर से शुरू करने पर यह सामाजिक सकारात्मक परिवर्तन में कारगर सिद्ध होंगे !! बस ज़रूरत है ज़ज़बे और जांबाज़ी से इन कलाओं को जिंदा रखने का संकल्प लेने की !! साथियों बात अगर हम 19 नवंबर 2021 को माननीय उपराष्ट्रपति द्वारा एक नाटक साहित्योत्सव में संबोधन की करें तो पीआईबी के अनुसार उन्होंने भी, दहेज जैसी सामाजिक बुराइयोंपर सामाजिक जागरूकता लाने में रंगमंच द्वारा निभाई गई ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख करते हुए, कहा कि इसमें अभी भी समाज में कई भेदभावपूर्ण प्रथाओं को खत्म करने की क्षमता है और सुझाव दिया कि इसे सामाजिक परिवर्तन के एजेंट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत जैसे आंदोलनों को लोगों के करीब लाने में नाटक और लोक कलाकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा आज नाटक, मंच नाटकों और रंगमंच के पुनरुद्धार और इन्हें सिनेमा के समान लोकप्रिय बनाने का आह्वान किया। यह देखते हुए कि मंच समाज में होने वाली घटनाओं को सच्चाई से दर्शाता है, उन्होंने जनता को इस कला रूप को संरक्षण और बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। इस अवसर पर बोलते हुए, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दर्शकों, विशेष रूप से युवा पीढ़ी को आकर्षित करनेके लिए रंगमंच कला को नए सिरे से तैयार करने की आवश्यकता है। उन्होंने लोगों के बीच राजनीतिक और सामाजिक चेतना लाने में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मंच नाटकों द्वारा निभाई गई प्रमुख भूमिका को याद किया, जिसमें गांधीजी जैसे नेता भी शामिल थे, जो बचपन में सत्य हरिश्चंद्र से प्रेरित थे। उन्होंने सुझाव दिया कि थिएटर को बढ़ावा देने के लिए सरकारी संरक्षण के अलावा, निजी संगठनों, नागरिक समाज और विशेष रूप से निजी टीवी चैनलों को आगे आना चाहिए। उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों से बच्चों को विभिन्न कला रूपों से परिचित कराने और उन्हें अपने पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में इन गतिविधियों को करने के लिए प्रोत्साहित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, इससे बच्चों में सामाजिक जागरूकता आएगी और उनमें नेतृत्व के गुण पैदा होंगे। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि नाटकों, रंगमंच, थियेटर और साहित्योंत्सव को पुनर्जीवित करना समय की मांग है जिसमें सरकारी संरक्षण, निजी संगठनों, निजी टीवी चैनलों, नागरिक समाज को आगे आने की ज़रूरत है तथा समाज में व्याप्त कई बुराइयों, भेदभावपूर्ण बर्ताव से उबारने, जागरूकता लाने तथा वर्तमान आधुनिक अभियानों का लाभ जनता तक पहुंचाने में नाटक रंगमंच थियेटर की महत्वपूर्ण भूमिका सिद्ध होगी।

-संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र