कॉप- 26 ग्लास्गो शिखर सम्मेलन

गोंदिया - वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम से भारी तबाही का अंदेशा वैज्ञानिकों और इस क्षेत्र के जानकारों ने व्यक्त किया है, जो हम पिछले कुछ वर्षों से सुनते आ रहे हैं जिसके खतरे को भांप कर, वैश्विक स्तर पर पेरिस समझौता जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी मुद्दों पर, सभी देशों के लिये, क़ानूनी रूप से बाध्यकारी एक अन्तरराष्ट्रीय सन्धि है। ये समझौता वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र के वार्षिक जलवायु सम्मेलन (कॉप-21) के दौरान, 196 पक्षों की ओर से 12 दिसम्बर को पारित किया गया था। 4 नवम्बर 2016 को यह समझौता लागू हो गया था। पेरिस समझौते का लक्ष्य औद्योगिक काल के पूर्व के स्तर की तुलना में वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखना है, और 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिये विशेष प्रयास किये जाने हैं। साथियों बात अगर हमइस पेरिस समझौते के भारत में पालन करने की करें तो जिस तरह प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पढ़ते सुनते हैं कि भारत ने रणनीति रोडमैप बनाकर ग्रीन एनर्जी, एलईडी बल्ब, सौर ऊर्जा, पेट्रोल में इथेनाल का प्रतिशत बढ़ाने सहित अनेक कार्यों को अंजाम देना शुरू किया है और पेरिस समझौते का पालन भारत पूर्ण रूप से करने की राह पर हैं। साथियों बात अगर हम जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों की करें तो, वैज्ञानिकों की यह बात सत्य है इसमें हमें भारी नुकसान होने का अनुमान है जो हम देख भी रहे हैं जैसे बिना मौसम बारिश लैंडलाइन का कहर, आसमानी बिजली का कहर, बाढ़ का कहर, ऐसा जिससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि पहले जैसा मानसून, ठंड, गर्मी का माहौल नहीं रहा किसी भी पल, कभी भी जलवायु परिवर्तन होकर सुष्टी के नियम बदल जाता है। साथियों बात अगर हम नुकसान की करें तो इस जलवायु परिवर्तन की मार किसानों पर अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पढ़ती है क्योंकि उनकी निर्भरता पूर्ण रूप से कृषि पर होती है। खरीफ़ और रबी किसानी फसल को बेमौसम वर्षा, बाढ़, सूखा, लैंडस्लाइड, से नष्ट होकर किसानों का नुकसान होता है जिससे वे तबाह होकर रह जाते हैं जो चिंतनीय है। यह मुद्दा पीएम ने कॉप- 26 में उठाया। साथियों बात अगर हम जलवायु परिवर्तन, पेरिस समझौता, कॉप- 26 इन सब मुद्दों को समझने की करें तो भारत एक ग्रामीण कृषि प्रधान देश है गरीबी और अशिक्षा की वजह से इन मुद्दों को आसानी से जनता समझ नहीं पाती कि ये क्या बला हैं!!! और पराली जलाना, धुआं करना, बंदियों में पत्तों को जलाना, आग लगाना, जलवायु परिवर्तन नियमों का पालन नहीं करना इत्यादि बातें शायद अनजाने में भी हो सकती है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों की किसानों सहित आम जनता को गहराई से जानकारी नहीं है। जिसके लिएहमें इन मुद्दों को आम जनता तक पहुंचाने के लिए एक विशाल जनजागरण अभियानतात्कालिक चलाने की ज़रूरत है। साथियों बात अगर हम जलवायु परिवर्तन के मुद्दों और संभावनाओं की कुछ दशक पूर्व और बाद की करें तो,पिछले 100 सालों में दुनिया का औसत तापमान 0.3 से लेकर 0.6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। आने वाले समय में अगले 100 सालों में ये 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। इस बढ़ोतरी के कारण ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघलने लगी है और समुद्रों का जलस्तर 10 से 25 सेंटीमीटर तक बढ़ गया है। एक अनुमान के हिसाब से साल 2100 तक समुद्रों का जलस्तर 50 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है!!! साथियों बात अगर हम दिनांक 1 नवंबर 2021 को स्कॉटलैंड के ग्लासगो में हुए कॉप - 26 शिखर सम्मेलन की करें तो हमारे पीएम महोदय ने भी भाग लिया और बहुत मज़बूती के साथ अपना पक्ष रखा।पीआईबी के देर रात प्राप्त विज्ञप्ति के अनुसार पीएम ने अपने तीन मुख्य विचारों सहित अनेक मुद्दों को उठाया उन्होंने कहा (1) एडेप्टेशन को हमें विकास नीतियों और परियोजनाओं का मुख्य अंग बनाना होगा (2) कई पारंपरिक समुदायों में प्रकृति के साथ सामंजस्य के साथ रहने का ज्ञान है, हमारी एडेप्टेशन नीतियों में इन पारंपरिक प्रैक्टिसिस को उचित महत्व मिलना चाहिए। ज्ञान का ये प्रभाव नई पीढ़ी तक भी जाए, इसके लिए इसे स्कूल के सिलेबस में भी जोड़ा जाना चाहिए। लोकल कंडिशन के अनुरूप साइफस्टाइल का संरक्षण भी एडेप्टेशन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हो सकता है। (3) एडेप्टेशन के तरीके चाहे लोकल हो, किंतु पिछड़े देशों को इसके लिए ग्लोबल सपोर्ट मिलना चाहिए। लोकल एडेप्टेशन के लिए ग्लोबल सपोर्ट की सोच के साथ ही भारत ने कोलिशन फोर डिजास्टर रेसिलिइंट की शुरुआत की थी। पीएम कहा कि देश में बारिश, बाढ़ और लगातार आ रहे तूफानों से फसल नष्ट हो रही है। पेयजल के स्रोत से लेकर किफायती आवास तक सभी को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लचकदार बनाने की ज़रूरत है। आगे कहाकि जलवायु पर वैश्विक बहस में अडपटेशन को उतना महत्व नहीं मिला है, जितना मिटिगेशन को, ये उन विकासशील देशों के साथ अन्याय है, जो जलवायु परिवर्तन से ज्यादा प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि कई पारंपरिक समुदायों में प्रकृति के साथ सामंजस्य के साथ रहने का ज्ञान है। हमारी एडेप्टेशन नीतियों में इन पारंपरिक प्रैक्टिसिस को उचित महत्व मिलना चाहिए। ज्ञान का ये प्रभाव नई पीढ़ी तक भी जाए। इसके लिए इसे स्कूल के सिलेबस में भी जोड़ा जाना चाहिए। लोकल कंडिशन के अनुरूप लाइफस्टाइल का संरक्षण भी एडेप्टेशन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हो सकता है। आगे कहा कि भारत समेत अधिकतर विकासशील देशों के किसानों के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती है।फसल पैटर्न में बदलाव आ रहा है। बेसमय बारिश और बाढ़ या लगातार आ रहे तूफानों से फसलें तबाह हो रही हैं। पेयजल के स्रोत से लेकर अफोर्डेबल हाउसिंग तक सभी को क्लाइमेट चेंट के खिलाफ लचीला बनाने की ज़रूरत है। आगे कहा कि ग्लोबल वार्मिंग दुनिया के लिए खतरा है. उन्होंने कहा कि विकाससशील देश ग्लोबल वॉर्मिंग से ज्यादा प्रभावित हैं। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन पर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भारत जैसे ग्रामीण और कृषि प्रधान देश में जलवायु परिवर्तन के संकट और दुष्परिणामों की जानकारी को आम जनता तक पहुंचाने के लिए तात्कालिक जनजागरण अभियान चलाना ज़रूरी है। 

-संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र