अहम खबरों में शहर की कभी,,,,,,

ख्याल  किसी का का कभी 

हम भी हुआ करते थे,

ख़ूबरू थे हम भी  कभी सच

ब कमाल हुआ करते थे,

किसी की गोर व फ़िक़्र में दिन

रात अपने लगा देते थे, 

सच कहूं किसी का इंतेज़ार

हम भी हुआ करते थे,

हमारा तआक़ूब किया करती

थी हजारों नज़रें ही,

अहम खबरों में शहर की  कभी

हम भी हुआ करते थे,

हमारे होने न होने से उन्हें अब

कोई फर्क नही पड़ता,

कभी हमारे  बिना बाखुदा  वो 

तो बेजान हुआ करते थे,

चांदनी रातें हमको भी कभी 

भली सी लगतीं थीं,

रातों को अक्सर तारे हम, तुम

भी तो गिना करते थे,

लोग नाम से तेरे  ही उन दिनों 

मुझ्को बुला लेते थे,

के नाम तेरा कभी मुश्ताक़ हम

भी तो हुआ करते थे,


डॉ . मुश्ताक़ अहमद शाह

"सहज़"

हरदा मध्यप्रदेश,,,,,