उपलब्धि व अहंकार

उपलब्धि व अहंकार

अक्सर सम्मिलन की चाह रखते हैं,

इसलिए प्रायः

साथ-साथ पाये जाते हैं;

दरअसल ज्यों-ज्यों उपलब्धियों का विमान

गगन की ओर अग्रसर होता जाता है,

व्यक्ति का ज़मीन से जुड़ाव

लगातार घटता जाता है;

वह भरपूर प्रशंसा पाता जाता है,

और जाने-अनजाने उसका अह्म बढ़ता जाता है;

प्रतिदिन आत्मचिंतन के अभाव में,

वह आत्ममोह में डूबता जाता है;

और जब उपलब्धि व अहंकार में

घनिष्टता बढ़ने लगता है,

तो उसके उन्नयन के पथ में

गति-अवरोधक बनने लगता हैं;

यहाँ तक कि ये दोनों की मित्रता,

सीधे अर्श से फर्श पर पटक सकती है,

या इंसान को कभी भी अचानक

फर्श के और नीचे गर्त में भी गिरा सकती हैं;

इसलिए चाहे प्रशंसा की झड़ी लग जाये,

घर की दीवारें, अलमारियाँ

सर्टिफिकेट्स और मोमेंटोस से भर जाये,

और तन-मन ख़ुशी से झूमने लगे,

सब ईश्वर को समर्पित कर आखें बंद कर लें;

दिक्कत नहीं साझा करने में क्योंकि,

अपनों की दुआओं के बिना हर ख़ुशी अधूरी है,

परंतु अहंकार से निज मन तो क्या

अपने बाह्य को भी अनछुआ रखना ज़रूरी है।

शशि दीप ©

मुंबई