मिट्टी के दीपक

आज याद करूँ परंपराओं को,

चकाचौंध से भूल गए हमलोग।

मिट्टी के दीपक जलाएँ सभी,

माँ लक्ष्मी को लगाएँ फिर भोग।।


बड़ी आस से रच रचकर,

इक इक दीपक रंगे कुम्हार।

आशा की नजरों से निहारे,

मेरी ओर भी देखो एक बार।।


इन दीपकों से उम्मीदें सारी,

लगाए हुए हैं घर परिवार ।

बिक जाएं यदि दिये सारे ,

पर्व की खुशी मनाएँ हजार।।


नए कपड़े और खरीदूँ मिठाई,

बच्चों के मुख मुस्कान फैले ।

यह सब मुझको मिल जाए यदि,

इनकी खुशियों के फूल खिले।।


हे दुनिया के लोग सुने सभी।,

कहे कुम्हार करके पुकार ।

इस दीवाली माटी के दीपक,

तुम जलाओ अपने घर द्वार।।


गीता देवी

औरैया उत्तर प्रदेश