दशानन

दशानन क्यों नहीं मरता

रावण बसा मानव के भीतर,

बुरा व्यवहार का वह प्रतीक।

अपने ऊपर विजय पाओ

मन में अपने राम को ध्याओ।

हर मन में अवतरित राम है,

रावण भी बसता मन मन में।

अपने सद्गुणों को पहचान,

जिसमें राम है बसता।

अगर मारना तुमने रावण,

सद्भाव अपने जगाने होंगे।

नारी का सम्मान करो तुम,

यह विचार लाने होंगे,

जननी वह तो है तेरी,

जो बलात्कारी तुम बनते हो।

खुद क्यों नहीं अपने रावण का,

तुम हनन करते हो।

अपनी कुत्सित विचारों को।

सद्वविचार राम से लाओ तुम,

हर साल विजयदशमी पर,

रावण मारा जाता है।

पुतला उसका बीच चौक में

यूं ही जलाया जाता है।

बुराई पर अच्छाई की जीत,

अग्निबाण मारा जाता।

रावण विद्वान बड़ा थाष

ज्ञानी ना उससा कोई।

अहम भरा था उसके भीतर,

उसी अहम ने मारा था।

हो रहा कुछ ऐसा ही,

अमान्य तत्वों का व्यवहार बड़ा है।

आप अपने मन के दुर्गुणों को मारो

सामने रामराज्य खड़ा है।

मन में सद विचार जब होंगेस

तो रावण मारा जाएगा।

उस दिन सही मायने में,

दशानन मारा जाएगा।

अपनी बुराइयों को जीतो,

दसों बुराई तुम जीतोगे।,

दशानन खुद मारा जाएगा।

फिर रामराज्य यहां होगा,

दुराचारी कोई ना होगा।।


                  रचनाकार ✍️

                  मधु अरोरा