दौड़ती हुई जिंदगी!

दौड़ती हुई जिंदगी में

किस-किस का साथ लूँँ

कभी आगे, कभी पीछे,

वाहनों की तरह रही जिंदगी,

पता नहीं थकी हूँ या नहीं।

 

जिस-जिस को देखूँ मन करता दौडूँ

भागतीं दुनिया में

किसी के लिए वक्त कहाँ?

वक्त होता कीमती

इसकी कीमत जानोंगे!


तब वक्त गया होगा दूर!

जिदंगी में अनेक चौराहें हैं!

किस पर रुकूँ या नहीं

रुकने लिए सोचूँ

लगता दुनियाँ निकल गई आगे

फिर दौड़ने लगती हूँ।


मंजिल पता नहीं कहाँ छुपी

मैं भी इरादे की पक्की

मंजिल खेल-खेला बहुत तूने!

अब दौड़ती आ रही हूँ,

तुझे पकड़ ही लूगी मैं 

दौड़ती हुई जिदंगी में।


परिचय - निकिता

छात्रा रामकुमारी कॉलेज मुकुंदगढ़

मु.पो. जाँटवाली, झुंझुनूं