गौरव

गौरव को अपने कूल की,

मिटाना नहीं,

सूर्यवंशी हो तुम चन्द्रवन्शी हो तुम।

अपने कुल की लाज बचाना सभी,

मर्यादा को तुम भूल जाना नहीं।

गौरव को........

मोह माया में पड कर,

कभी दिल दुखाना नहीं,

दिल दुखाना ही सबसे,बडा पाप है।

पाप को तुम गले से,लगाना नहीं,

हो न जाये कहीं दूर ,हमसे कोईl

गौरव को......

साथ लेकर चलो,करवां अपना तुम,

देख लेना कोई,साथी छूटे नही।

रह न जाये,रह न जाये अकेला कोई,

अपनी गरिमा में।,दाग लगाना नहीं।

गौरव को.......

जीते तो हैं सभी,अपने लिए,

जी लिया जो, सभी के लिए।

बन गया राम  कृष्ण द्वारिकापति,

वो सभी के लिए,वो सभी के लिए।

गौरव को.....

रह गया जिन्दगी का,

कोई अब ठिकाना नहीं,

जीते जी न किया,लौट कर

फ़िर कोई यहाँ आया नहीं।

रह गए जो अधूरे ,कर्म कहीं,

आत्मा को रहेगा, गवारा नहीं।

गौरव को....

लेते है एक शपथ ,

फ़िर यहाँ, आओ मिल कर चलें,

आओ मिल कर चलें।

दूरियों को मिटाकर,

हम दिलों को मिलाकर,

जोड कर हम दिलों को दुबारा चले।

गौरव को.........


वंदना यादव,वरिष्ठ कवयित्री व 

शिक्षिका चित्रकूट-उत्तर प्रदेश