सब भुलाकर

पीली पीली मिट्टी

ठंडा ठंडा मौसम

गुमड़ते हुए बादल

छिपा हुआ भाष्कर

चीं चीं करती चिड़ियां

बहती हुई मंद हवा

लड़ते हुए बंदर

मुंह चिढ़ाते पूँछ हिलाते

एक महका सा अहसास

कुछ अलग सा ही राग

जैसे बना हो फुर्सत से

जड़ दिया हो कुंदन से

खेलती बच्चों की टोलियाँ

हाथों में लगी पिचकारियां

गुलाल से सजी थालियां

रंगों से मनतीं होलियां

गले लगते हुए लोग

देते हुए बधाईयां

मिटटी की भीनी खुशबू में

मिट्टी की महक मिल जाती

प्रेम हर्ष और उल्लास में

मानवता की इस बहार में

जलती हुई होली में

झोंक दें सारी नफरतें

मिले सब से सब भुलाकर

अपनों को अपना समझकर

पूनम पाठक बदायूँ

इस्लामनगर बदायूँ