लाल बहादुर शास्त्री

हिन्द की मरुभूमि पर,  

आया एक ऐसा इंसान।  

नाम शास्त्री था जिसका,  

कर्म से था जो बहुत महान।।    

 

कद के छोटे दिखते थे पर,

थे, माँ भारती के आँखों के तारे।  

साधक सच्चे अर्थो में,  

थे हिन्दूवासिओ के प्यारे।।    


न था कोई आडम्बर,  

देशप्रेम से थे ओतप्रोत।  

भारती के सच्चे सपूत और,  

दिव्य ज्ञान की थे एक जोत।।  


कथनी में विश्वास नहीं था,  

करनी में विश्वास था उनको।  

ऊंचा हिमालय से ध्येय था जिसका,  

स्वतंत्रता दिलाने का श्रेय है उनको।।  


भारत छोडो आंदोलन में,  

मरो नहीं मारो का नारा दिया।  

और स्वतंत्र होने में,  

माँ भारती को सहारा दिया।।  


देश के भीतर कृषको को,  

सीमाओं पे रक्षको को, पूरा स्वाभिमान दिया।  

जय जवान जय किसान का नारा अमल में ला कर,  

उनको पूरा सम्मान दिया।।  


पर कुछ लोगो को खटक गए थे,  

आँखों में तुम अटक गए थे।  

अपनी इसी दृढ़ निष्ठा से,  

जब पाक को तुमने पटक दिया था।।  


स्वांग रचा कपटी धूर्तो ने,  

फिर जो ताशकंद में खेल हुआ।    

समझ सके न तुम कपट को,  

वहां मृत्यु से मेल हुआ।।    


उलझा दिए सब रहस्य वही पर,  

आज तक गुत्थी सुलझ न पायी।  

ऋणी रहेगा कण कण तेरा,

भारतवासी है तेरे अनुयायी।।  


तुम भारत की शान हो,  

सारे भारत का अभिमान हो।  

नहीं भूलेगा कभी ये जग,  

तुम सबके दिल में विद्यमान हो।।


स्वरचित एवं मौलिक रचना

रवि शर्मा अल्मोड़ा ( सल्ट ) उत्तराखंड