।।शरद का यौवन।।

शरद चाँदनी बरस रही है,

रजत हो रहा है कण कण।

नील वसन पहन यामिनी,

तारों  से  भरती  दामन ।

निरख रही चन्द्र सजन को,

पीयूष  पी  रहे  नयन ।

शुभ्र रश्मियों की छुअन से,

पुलकित हो रहा है तन मन।

नेह बरसता अमृत बनकर,

धवल चारू की किरणों से।

शरद निशा का श्यामल यौवन,

ताक रहा  है  मुग्ध  मयंक।

बरस रहा है अमिय विधु से,

किरणें  आती हैं  छन छन ।

रैन दीवानी हुई सयानी,

चंचल तारक सखियों के संग।

मधुर मदिर हो गई दिशायें,

पूर्ण कला पा गया सारंग।

बना वितान सारा भूमंडल

बह रहे पवन अंगन संग संग।

          अम्बिका प्रदीप शर्मा