कितने चौराहें

गाड़ियों के शोरगुल के बीच वो चलती जाती है। गतंव्य स्थान तक पहुँचने के लिए बस की यात्रा ही नहीं करनी पड़ती उसे! रोज कितनी ही उदासी,बैचेनी, छटपटाहट, भावों के आवेग को पार करना पड़ता है। रोज सुबह घर से जल्दी-जल्दी कुछ खाये- पिये बगैर कितनी कुछ समेटकर और कितना कुछ बिखेरकर जिंदगी को साधने चल पड़ती है। उसके एक भ्रम-सा हमेशा साथ रहता है कि हम खुश है पर हृदय के अन्तःस्थल के मार्मिक स्थलों पर कोई पहुँचें तो जान पाये यहाँ कितना खुरदरापन है। मुख की मंद स्मित रेखा से सारे खुरदरेपन पर एक लेप लगा लगाये रहती है।

रोज प्रातः अरूण किरणों से उलझती हुई पथ पर आगे बढ़ती जाती है और फिर संध्या की अरूण किरणों में लिपटती हुई घर चली आती है। दिनभर में कितना कुछ होता है इसका उसके पास कोई हिसाब नहीं। आज वर्षों बीत गये! बदलाव के कई दौर आये समकालीन समाज में परन्तु उसके जीवन में कोई नया आकांक्षानुरूप बदलाव नहीं आया। प्रिय परिजन बिछुड़ते जा रहे है। वो है कि अपने पथ चलती जाती है। आशा की हर किरण मंद होती जाती है संध्याकाल की रवि किरणों की तरह।

जैसे ही घंटी बजी कॉलेज की छात्राएं कमरों से निकल भागी। स्टाफ रूम में आकर देखा तो सूचना पट्ट पर एक सूचना चिपकी हुई थी। उसमें लिखा छुट्टी के बाद सभी विभागों के अध्यक्षों के साथ गोष्ठी है। कहाँ मन उड़ने को बेताब था सूचना पढ़ते ही फड़फड़ाकर पंख कटकर गिर गये। गोष्ठी चल ही रही थी कि बार- बार ध्यान घड़ी की ओर अटक जाता। तय समय से आधा घंटा ज्यादा लगा। 

जैसी ही गोष्ठी समाप्त हुई उम्मीद भी टूट गई। सूर्यास्त की लालिमा ने सूचना दे दी कि जीवन का सवेरा भी समाप्त होने के कगार पर है अपनी रक्षा के उपकरण शीघ्र खोज लो। कॉलेज से बाहर निकलते ही पाँच मिनट की पैदल दूरी पर बस मिलती है। जल्दी-जल्दी पैर उठाने के चक्कर में साँसें फूल गई,सारा उत्साह चला गया,शरीर निस्तेज हो गया। चेहरे की हवाईंयाँ उड़ने लगी। दूर..३... टकटकी लगाये वो पार देखना चाहती है। बस के बहाने ही सही हर बार चौराहें पर खड़ी हो जाती है। ये चौराहें सिर्फ सड़कों पर ही नहीं जीवन में अनेक चौराहें है। चौराहें पर गाड़ियों की टक्कर से धूल उड़कर तिरस्कार करके कह जाती कि तुम्हारा जीवन व्यर्थ है। कौन याद रखेगा तेरे इस त्याग को,इस पीड़ा को ! जिंदगी के चौराहों से निकल पाना इतना आसान नहीं है। यें जिदंगी न जानें कितने ही चौराहों में फँसी हुई है। 

चौराहें से गुजरती तेज रफ्तार कारें जैसे ही उसके सामने से गुजरती है वो एकटक देखते शून्य में खो जाती हैं। वो सोचती है इन चौराहों पर कितनी ही महिला अक्सर खड़ी रहती हैं। क्या सड़क के चौराहें असल जीवन के चौराहे नहीं होतें। चौराहें पर न जाने कितनी नजरे क्या देखना चाहती है? पर वो तो बस के इंतजार में खड़ी है। पर वो समस्या से हट कैसे सकती है! अचानक उसे किसी ने आवाज दी श्वेता मैडम क्या हुआ? बस नहीं मिली?

वो आवाज सुनकर भी नहीं सुनी। विचारों के अश्व पर लगाम कौन लगायें! बस आई! बैठकर चल पड़ी। फिर नये चौराहें पर। 

परिचय - ज्ञानीचोर

मु.पो. रघुनाथगढ़,सीकर राज.