पल

एक एक पल को

अपने संवार लूं मैं।

जीते तो रोज हैं क्यूं न

आज खुद के लिए जी लूं मै।

कुछ शौक पूरे कर लूं

कुछ खवाहिशें उभार लूं मैं।

व्यस्ततम सी जिंदगी में

कुछ पल सुकूं तलाश लूं मैं।

खुशियां सभी की साथ लेके

अपनी खुशी से जोड़ दूं मै।

खोते हुए संस्कार जो हैं

आज फिर नवलताा जोड दूंं मैं।

कर्तव्य निर्वहन में कहीं

खो ना जाएं शौक मेरे।

आओ आज दो पल

जिंदगी से

खुद के लिए चुरा लूं मैं।

दादी नानी के हुनर को

आज फिर जिंदा करूं।

आती हुई पीढ़ी को कुछ

नया सा उपहार दूं मैं।

एक एक पल को अपने

संवार लूं मैं......

वंदना यादव

वरिष्ठ कवित्री एवं शिक्षिका 

चित्रकूट-उत्तर प्रदेश